मैचोंग तूफ़ान
ठंडी हवा से मुंह धोते धोते थोड़ा खोने लगी थी की ख़्याल आया, शायद यह जमीन से टकरा कर आई हो, जाड़े सी ठिठुरन थी मिचौंग तूफ़ान की फिर भी धूसरित हवा जो मानो चेहरे से चिपक ही गई थी, मैंने पानी से चेहरा साफ करना तय किया। जो हवा से भी ठंडा था, कुछ वक्त बीतते ही हवा फिर उफ़ान से चहलकदमी करने लगी, चेहरे पर बढ़ती चढ़ाई थी और बार बार मुंह साफ़ करने की ज़िद। मेरे दिल से यह बात मिटनी मुश्किल हो गई की यह किसी पर ठहर कर नहीं आई हो, की यह किसी से टकरा कर नहीं आई हो, की मेरे नथुनों में प्रवेश के पहले अपने पैर झाड़ पोंछ कर आई हो या नहीं।इस हालात का हल निकालने मैंने खिड़की से झांकना तय किया, जिसे पता नहीं कैसे उसने मेरा खुला न्यौता समझ लिया और पूरे जोरों शोरों से दल बदल कक्ष के अंदर घुसने लगी। "अरे, अरे यहां कहां घुसी चली आती हो, रुको रुको..",
एकाएक आंख मूंदकर मैंने चिल्लाना शुरू कर दिया, पर शायद उसकी सुनने की ताक़त ख़त्म हो चुकी थी, बस नज़र थी जिसका निशाना मेरे कान और आंखे बींधना था, मैंने अंदाजे से उसके कान के तरफ़ हाथ बढ़ाया, उनको पकड़ कर अपने तरफ़ खींच कर पीछे धकेल दिया, वह सकते में आ गई। तभी मेरे कंधे पर थोड़ा धक्का लगा। मेरे मानने में नहीं आ रहा था, यह इतनी बली कैसे हो गई की इसने मेरे कंधो को झकझोर दिया, हालात का जायज़ा लेने मैने ज्यों ही आंखो को खोला पास ही मां को बैठा पाया।
शायद सब कुछ सपने में चल रहा था। मां हैरान भंगिमा से मुझे देख रही थी। शायद वह मेरी बड़बड़ाहट सुन कर घबरा गई थी, और मुझे उठाने आई थी। खिड़की अब भी खुली थी मगर तूफान जा चुका था। उसके नन्हें रूप भी नगण्य थे। जहां कान के आकार की दो पत्तियां पड़ी थी।
—प्राची शर्मा
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