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बुधवार, 21 मई 2025

मैचोंग तूफ़ान

मैचोंग तूफ़ान

ठंडी हवा से मुंह धोते धोते थोड़ा खोने लगी थी की ख़्याल आया, शायद यह जमीन से टकरा कर आई हो, जाड़े सी ठिठुरन थी मिचौंग तूफ़ान की फिर भी धूसरित हवा जो मानो चेहरे से चिपक ही गई थी, मैंने पानी से चेहरा साफ करना तय किया। जो हवा से भी ठंडा था, कुछ वक्त बीतते ही हवा फिर उफ़ान से चहलकदमी करने लगी, चेहरे पर बढ़ती चढ़ाई थी और बार बार मुंह साफ़ करने की ज़िद।
 मेरे दिल से यह बात मिटनी मुश्किल हो गई की यह किसी पर ठहर कर नहीं आई हो, की यह किसी से टकरा कर नहीं आई हो, की मेरे नथुनों में प्रवेश के पहले अपने पैर झाड़ पोंछ कर आई हो या नहीं।इस हालात का हल निकालने मैंने खिड़की से झांकना तय किया, जिसे पता नहीं कैसे उसने मेरा खुला न्यौता समझ लिया और पूरे जोरों शोरों से दल बदल कक्ष के अंदर घुसने लगी। "अरे, अरे यहां कहां घुसी चली आती हो, रुको रुको..",
एकाएक आंख मूंदकर मैंने चिल्लाना शुरू कर दिया, पर शायद उसकी सुनने की ताक़त ख़त्म हो चुकी थी, बस नज़र थी जिसका निशाना मेरे कान और आंखे बींधना था, मैंने अंदाजे से उसके कान के तरफ़ हाथ बढ़ाया, उनको पकड़ कर अपने तरफ़ खींच कर पीछे धकेल दिया, वह सकते में आ गई। तभी मेरे कंधे पर थोड़ा धक्का लगा। मेरे मानने में नहीं आ रहा था, यह इतनी बली कैसे हो गई की इसने मेरे कंधो को झकझोर दिया, हालात का जायज़ा लेने मैने ज्यों ही आंखो को खोला पास ही मां को बैठा पाया।
 शायद सब कुछ सपने में चल रहा था। मां हैरान भंगिमा से मुझे देख रही थी। शायद वह मेरी बड़बड़ाहट सुन कर घबरा गई थी, और मुझे उठाने आई थी। खिड़की अब भी खुली थी मगर तूफान जा चुका था। उसके नन्हें रूप भी नगण्य थे। जहां कान के आकार की दो पत्तियां पड़ी थी।

—प्राची शर्मा

मंगलवार, 20 मई 2025

मुबादला

मुबादला


बुधवार का दिन, एक बहुत बड़ा बाज़ार,

और

एक वार्षिक उत्सव के चलते, चहल पहल वाली दोपहर,
ऊपर नीले आकाश में एक स्वर्ण से रंग रूप वाले देव बड़े गौर से

आते जाते लोगों को देख रहे थे,

अनेकानेक जन आते जाते एक दूसरे के या अपने काम से मतलब रखने वाले,सैकड़ों, हजारों लोग, आकाश से यह एक समुद्र जैसे दिख रहा था, जिसके असंख्य शीश है, इनके तलों में खारा पानी ना होकर माथे से टपकता था, देव थोड़े परेशान हुए,


बेचैन हुए, उन्हें लगा, पिछले सप्ताह उनके भीतर उठने वाले ज्वालामुखी के फलस्वरूप यह भीषण गर्मी उपजी है, जिसके कारण,
उनके नेत्रों में इतनी ऊष्मा आ गई है, और नतीजतन, मानव नेत्रों में समुद्र सदृश्य वातावरण निर्मित हो गया है। और इस तापमान को कम होने में अभी सर्दी के आने के जितना वक़्त था, वह इन लोगों को थोड़ी राहत देने का सोचने लगे, भाव विह्वल होते देव को तब एक फेरी वाला हरकारे की तरह आवाज़ लगाता धरती पर जाता दिखा। वह कहता जा रहा था।

पश्चिम की ओर से आती, यह तल्खी भरी आवाज़ ने उमस में और अधिक कांटे बोने शुरू किए, ऐसे समय में बहुत सारे लोग इर्द गिर्द इकट्ठे होने लगे, उस ओर जाने लगे जहां से वह विश्राम को जायेंगे। तब वह व्यक्ति और ज़ोर ज़ोर से आवाजें देने लगा।

"बेचैनी है,

बेचैनी है,

बहुत सारी बेचैनी है,

जल्दी बोलिए,

दाम सिर्फ एक पल !,

कीमत गौर से सुनिए, सिर्फ एक पल,

सिर्फ़ एक पल,

खिदमत हमारी, पसन्द आपकी !",

वह विभिन्न दर्शनों की किताबें बेच रहा था,

फुसफुसाहट शुरू हो गई,

ऐसे रुपए तो किसी के पास नहीं थे, जिसे चुका कर वह बेचैनी ख़रीद लेते, अच्छे तमाशे की चाह में भीड़ बढ़ने लगी,

ऊपर आकाश में देव ये बढ़ती सुगबुगाहट देख खुद को रोक नहीं पाए, और ऐड लगा दी। हिनहिनाते घोड़े मानो पहिए बन गए,
इधर फर्राटे की आवाज़ से एक शानदार और चकमक गाड़ी रुकी, उस से एक संभ्रांत व्यक्ति बाहर आए। उस हरकारे की महफ़िल जहां पश्चिम का गढ़ था, वह वहां मुस्कुराते हुए चले गए।

"मुझे खरीदना नहीं है, क्या यहां, मुबादला होगा?" देव ने कहा। ढेर सारी नज़र उनसे टकरा रही थी, पर अंधेरा हो जाने के कारण कोई उन्हें देख नहीं पाया।

-प्राची शर्मा 
©2024
सर्वाधिकार सुरक्षित 

शुक्रवार, 29 सितंबर 2023

लघुकथा भाग पांच, नरमी, सलाह, और अन्य लघुकथाएं। मशविरा, रोज़ाना की एक बात,

लघुकथा (भाग पांच)
Hello Friends,
 आज पढ़े लघुकथा अंक पांच।



नरमी

"जब बात बिगड़ जाए..........", 

(बीच में टोक कर)

"उसे डांट कर सुधारना "

"अरे रे रे यह क्या कह रहे", 

"आ हां बच्चा बिगड़े तो..."


Father's discussing young generation actions

"मैंने बच्चा नहीं बात कहा था" 
"ओह माफ करना, मेरे बेटे ने मुझे बहूत परेशान कर दिया है, वैसे.. बात बिगड़े तो थोड़ा ज्यादा नर्मी से पेश आया करो" 
"तुम भी..", 
"हां शायद यही ठीक है। 

(लघुकथा)


सलाह मशविरा

"अगर शिकार के मुँह से उफ़्फ़ नहीं निकलेगा! तब भला लाचारगी का क्या भाव मिलता?" "फिर भी दोयम दर्जे के नौकरी से बाज आना चाहिए",
Two person discussing unemployment problem



"कौन जानता है दोयम कौन आ'ला कौन, फिर जितनी होशियारी दिलानी मुनासिब थी हमने दिलाई "

"तब तो ये भी बहुत है", उसने दीदे नीची

कर कहा ।

(लघुकथा)


रोज़ाना की एक बात

"चलो, अकेले ही टहलते हैं",
"भले मरुस्थल ही हो?" 
Man walking in desert


अवाक देखते हुए, उसने इशारा किया। राहगीर समझ सकता उससे पहले एक खंजर उड़ कर सीधे उसके मर्म स्थल लग गया, वह पल के पल में ढेर हो गया। तलाशी लिया गया मात्र कुछ गहने मिले, मगर पीतल के निकले, टोली के सरदार ने अफसोस से कहा, "बेकार मारा गया।"


श श श श 

"अपनी सुनाओ तुम कैसे हो",
"कुछ ठीक नहीं है",
"ओह हुआ क्या?",

" श श श .... धीरे..... मेरी सास सो रही है"

(लघुकथा)


फेसबुक

"शब्दों के धुरंधर को आज शब्द नहीं मिल रहे, बस इतना पूछा है मैंने कुछ कर के भी दिखा देते, मां के लिए जो इतनी कविताएं गढ़ते हो फेसबुक पर ।" 
बगले झांकते बड़े भाई की पत्नी ने कहा: "तुम्हारी भी तो मां है अपने साथ ले जाओ" छोटा सकपका गया।
Interview of an aged writer



अंततः अंतिम संवाद के बाद अंतिम संपत्ति को तीन तीन महीने के लिए भाग किया गया।

(लघुकथा)


लेखिका

"किसी की याद लिखवाती है हमसे

वर्ना आयु का प्रकोप ऐसा है की चार पग। चलूं तो, ऊंह ऊंह", मैं खांसने लगती हूं। पत्रकार : पिचासी की अंक और बस आपकी लेखनी सरपट दौड़ते जा रही हूं, क्या सचमुच में किसी अन्य का ही प्रभाव है?",
Mother's illness and sons


 "ऊंह वह बात ये है, ऊंह ऊंह, ऊंह " मैं अचेत हो कर गिर पड़ी, उपस्थित सभी घबरा गए, मेरे नाम का स्वर, सर्वत्र गुंजायमान था। मैं खांसते खांसते अदृश्य हाथ पकड़ कर आगे बढ़ गई।

(लघुकथा)


घी

"ये बात तो ग़लत है पर सीधी उंगली से घी न निकले तो, उंगली टेढ़ी करनी ही पड़ती है"

"हुंह"

कुछ दिन बाद

पुलिस थाने में परेशान वह एक दूसरे को ताक रहे थे किसी ने घी का डब्बा आग के ऊपर ही रख दिया था।

(लघुकथा)


पार्टनरशिप

"मैंने पूछा था? ना मैंने तुम्हें कभी नहीं पूछा, तुम जबरदस्ती गले पड़ रहे", 
"वाह! चोरी पर सीना जोरी, साथ दिया मैंने पूरा, अकेले तुम भी माल नहीं उठा सकते थे, समझे!" 
Two thief fighting before police


" अरे जाने दे जाने दे, बड़ा आया", दोनो चोरों का झगड़ा बढ़ते हुए हाथापाई की नौबत आ गई, लड़ते लड़ते वह खुद ही पुलिस के पास पहुंच गए।

(लघुकथा)

समाप्ति

पाठकों आशा है यह अंक आप सभी ने पूरा पढ़ा हो, अन्य अंक पढ़े, इसी ब्लॉग में।



©2020-2023
कॉपीराइट: सीमा शर्मा, प्राची शर्मा
सर्वाधिकार सुरक्षित।

शनिवार, 26 अगस्त 2023

करीबी, इल्म, दिल, नसीहत और कश

करीबी

तुम संग हर लम्हा,
मुझे हक सा लगता रहा,
कभी लहम की आशिकी रही नहीं, 
कोई ज़ख्म दे कर,
ख़ुद मैं ही झूठी आह भी कैसे भरती, 
चल, 


कुछ और ग़लत फ़हमियों का क़त्ल करें! साथ में रो लें और अपना रुमाल भी सूख जाए।

- लाली

इल्म 

दिल सुधर जा,
कि ये इम्तिहान की तस्दीक है,
न चाह उसे और, 
कि वह नजदीक है,


जो इल्म भी हो जाये उसे, 
किसी ख्वाहिश की, 
आने देना न, 
ये आलम, हँसी कर दे तो गम नहीं, 
हां में मेरी ही मुश्किल बढ़ जाएगी।

-सीमा

दिल

पत्थर से बने इंसान, 
लहम के बने दिल पर,
सर रखते है! 


पूछिए,
की खूं-रेज़ी क्यों ना होगी!

-प्राची शर्मा

नसीहत

आराम के लिए,

शम्स का क़त्ल,

बेहद ख़राब है,

झूमना है, 

बिना काहिल हुए,

फिर भी नशा करना,

बेहद ख़राब है,

जबान की मालिश,

लज़्ज़त से ही करनी है, 

लेकिन खूं रेज़ी से ? 

बेहद ख़राब है,



सिर्फ़ तरक्की हासिल करनी है,

लेकिन सिर तक ऊपर जा रही है,

जो नज़र,

उन नसीहतों को ना मानना बेहद ख़राब है!!

-सीमा शर्मा

कश

हर एक सफ़ेद कागज़ पर,
ताज़ी आशिक़ी भरे,
इंतज़ाम उसके करगुजारियो पर किया करे, भागती सरपट शायरी,


कलम जिंदगी की मियाद लिखा करे, 
सुलगा रहे है होंठ,
बेफ़िक्री से, 
जैसे टक्कर से कोई हट जाए परे,
हज़म किया एक दिन उसे, 
उसी मुड़ी सफ़ेद कागज़ ने!

-सीमा शर्मा


कॉपीराइट 2023
©सर्वाधिकार सुरक्षित 
सीमा शर्मा, प्राची शर्मा 
सभी चित्र, Bing Chat AI द्वारा निर्मित

शुक्रवार, 11 अगस्त 2023

Ninad, My profession beginning

निनाद



"एक वृत्तांत याद आता है, दो छात्राएं मेरी कक्षा में अंतिम बेंच में मेहंदी लगा रही थी, पहले-पहल मैं हड़बड़ा गई, सोचा अपना ध्यान ही हटा लेती हूं लेकिन लगता थी कि उन दोनों का अपने प्रिय कार्य को विराम देने का मन था ही नहीं।
मैंने उनसे ऊंचे स्वर में उनसे कहा "कृपया पढ़ाई में ध्यान दीजिए" उनके एक मित्र ने तत्काल टिप्पणी करते हुए कहा "करने दीजिए मैडम, लगे रहो इंडिया, लगे रहो।"

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 ||श्री गणेशाय: नमः||

श्रृंखला भाग एक

 सन् २००४, अगस्त,

पहली कक्षा हो या पहला ब्लॉग, ज्ञान विस्तार को ही मैं लक्ष्य मानती हूं। मेरी पहली कक्षा, एल एल०बी० प्रथम वर्ष, भारतीय संविदा अधिनियम, १८७२, की थी, आरम्भ में विस्तृत पाठ्यक्रम, प्रश्न पूछे जाने का भय और नए वातावरण, मैंने स्वयं भी विधि स्नातक तथा विधि स्नातकोत्तर के समय अधिकाधिक स्वयं पाठ से पूर्ण किया है। अतः यह प्रथम अनुभव स्वयं को संयत करने का तथा आत्मविश्वास में वृद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक था, कुछ हृदयस्पर्शी वृत्तांत ऐसे भी रहे जहां मेरी कक्षा के विद्यार्थी यह कह के उत्साहवर्धन किया करते थे,
"मैडम, कोशिश करते रहिए आप सीख जाएंगी"।
<classroom>


"मुझे ज्ञात है मैं कभी भी अति कठोर या अति उदार नही थी, उद्दंड विद्यार्थियों को चेतावनी देने से, कुशाग्र विद्यार्थियों के उत्साह वर्धन तक सीमित रही।"
एक वृत्तांत याद आता है, दो छात्राएं मेरी कक्षा में अंतिम बेंच में मेहंदी लगा रही थी, पहले-पहल मैं हड़बड़ा गई, सोचा अपना ध्यान ही हटा लेती हूं लेकिन लगता थी कि उन दोनों का अपने प्रिय कार्य को विराम देने का मन था ही नहीं।
मैंने उनसे ऊंचे स्वर में उनसे कहा "कृपया पढ़ाई में ध्यान दीजिए" उनके एक मित्र ने तत्काल टिप्पणी करते हुए कहा "करने दीजिए मैडम, लगे रहो इंडिया, लगे रहो"।
इस बार मैंने तनिक क्रोध से फिर कहा, "वरना आप बाहर जा सकते हैं!", उनलोगों ने हड़बड़ा के अपना काम बंद किया, मुझे इस साहस पर हर्षमिश्रित गर्व अनुभव हुआ।
कई छात्र-छात्राएं, कक्षा मेंं ना ठहर के यदा-कदा बाहर ही दिखाई देते थे, कक्षा के दरवाजे के पास, लगातार बातचीत करते रहना या शोर करना, बहुत समय तक अनजान बने रहने के बाद, मैंने बोलने का मन बनाया, "देखिये आप सभी कक्षा मेंं बैठिये या इस जगह ऐसा व्यवहार मत करें!", मेरे कहे जाने का त्वरित असर हुआ, सारे के सारे उठ कर वहाँ से छू-मंतर हो गए। 
<students>


धीरे धीरे मैंने भी थोड़ा अधिक धैर्य रखना का प्रयास भी किया। समझना क्या होता है, अधिनियम, संहिता, कानूनों का निर्वचन, कौन किस प्रकार संबंधित है, कैसे एक एक धारा से आगे बढ़ते हुए पूरे अधिनियम, संहिता को समझा जा सकता है, दृष्टांत, व्याख्या , अन्य प्रकरण किस प्रकार से विधि को सर्वसम्मत बनाते हैं। शिक्षण कार्य, किसी अन्य कार्य से भिन्न है, चूंकि, इसमें शिक्षक के साथ विद्यार्थियों के मष्तिष्क का समता से विचार करते रहना आवश्यक है, मूलतः मैं हिंदी भाषी हूँ, आधुनिक समय अंग्रेज़ी भाषा के प्रभाव से लबरेज हैं, तथा सभी विद्यार्थी एक जैसे नहीं होते, कई को हिंदी के गूढ़ शब्द या वाक्य सर के ऊपर से चले जाते है, या हिंदी माध्यम के छात्रों को अंग्रेजी से यही आशा रहती हैं, ऐसे समय में "बेयर एक्ट" के द्विभाषी पुस्तक से बहुत सहायता रहती है, जैसे पहले हिंदी से पढ़ाना, पुनः उसे अंग्रेजी में पढ़ाना, मैं सर्वदा से यह मानती हूं कि पढ़ाने वाले व्यक्ति और पढ़ने वाले व्यक्ति में तारतम्यता बनी रहनी चाहिए। मैं सदैव प्रयासरत रहती हूं कि सीधे प्रश्नोत्तर करती रहूं , मेरे पढ़ाये हुए कितने ही विद्यार्थी आज विभिन्न न्यायालयों एवं उच्च न्यायालय में कार्यरत है, नए छात्रों के साथ जब कभी मैं उच्च न्यायालय के दौरे के लिए गई हूं, मुझे मेरे विद्यार्थियों से कई बार सामना हुआ है कई बार अलग अलग तरह के प्रकरण चाहे वह व्यवहार प्रक्रिया संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता एवं भारतीय दंड संहिता, इनका साक्ष्य अधिनियम के साथ समन्वय इसमें तर्क, साक्ष्य, में इनकी व्यवहारिकता कक्षा से पृथक ही रहती है यह भी जानने लायक है कि विधि की शिक्षा कक्षा से अधिक न्यायालय में है।
मेरे सर्वाधिक प्रयास इस हेतु रहते है कि मैं किन्ही भी छात्र - छात्राओं में कोई भेद ना करूँ। मेरी कक्षा में एक वयोवृद्ध सज्जन जो सेवानिवृत्त सिविल सर्जन थे से मेरी पहली भेंट थोड़ी हकलाहट से हुई, सारे संबल बटोर कर जब वह अपने जीवन गाथा स्वयं के अनुभव बताने लगे, थोड़े संयम से मैंने भी कहा "यहाँ आप भी छात्र है", धीरे-धीरे सारा ध्यान मेरी तैयारी पर सिमट, मैंने कर अध्यापन कार्य आरंभ किया, कोई एक सप्ताह बाद मेरी उनसे पुनः भेंट हुई तब और अब में मैंने अंतर देखा अब स्वर कहीं विनम्र था, पहले की बात जो कि मुझे ज्यों की त्यों याद थी मैंने उनसे उनकी समीक्षा की बात की, प्रफुल्लित होकर उन्होंने कहा " सबसे अच्छी आपकी आवाज और आपके पढ़ाने का अंदाज़", दृष्टिकोण बदलते समय नहीं लगता, ये अब मैं समझ गईं थी, प्रयास अति महत्वपूर्ण हैं तो सही दिशा भी!
 मेरे विचार में छात्रों को माध्यस्थम अभिकरण का दौरा अपने शिक्षण काल मे अवश्य करनी चाहिए, जिला एवं सत्र न्यायालय से भी जरूर शिक्षा ग्रहण करना चाहिए। मूल ज्ञान के लिए सर्वप्रथम विधि की शिक्षा हेतु छात्रों को अधिकाधिक धैर्य और विनम्रता का अभ्यास करना आवश्यक है, बहुतायत यह कहा जाता हैं कि अधिवक्ता सफलता के लिए दसियो वर्ष तक निरंतर संघर्ष करते हैं, वकालत के लिए सर्वप्रथम स्वयं के भाषा का उच्च ज्ञान आवश्यक हैं, एवं विधियों का, नए न्याय दृष्टान्तो का प्रकरण अनुसार प्रयोग करना, बिना संकोच के न्यायधीशों के समक्ष वादी का पक्ष रखना, वादी से उसके प्रकरण के पूर्ण संसूचना का फ़ाइल बनाना, ऐसे नैदानिक कार्य जो केवल न्यायालयों में सिखाये जा सकते हैं, मेरी इच्छा है कि अधिकाधिक महाविद्यालयों में यह शिक्षण सामग्री विस्तृत रुप मे पढ़ाई जाए जहां केवल मूट कोर्ट के विषय अप्रभावी है।
 मुख्य रूप से मैंने वक्ता बनना सीखा है, मुझे कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों में मंच सम्भालने, गीत गाने, अथवा प्रमुख बनाया गया, मूट कोर्ट मे न्यायाधीश बनने का भी मुझे अवसर मिला।
चूंकि वकालत केवल व्यवसायिक उद्देश्य तक सीमित नहीं हैं मेरे प्रयास ना केवल पाठ्यक्रम पूर्ण हो जाने तक था बल्कि मैंने सभी छात्र- छात्राओं को मार्गदर्शन देने से कभी नहीं नकारा।
मेरी पढ़ाई जिस कक्षा में होती थी वहां आज मैं पढ़ा रही थी, अब दुनिया सचमुच गोल लगती थी, वैसे, केवल भौतिक विज्ञान का प्रभाव नहीं बल्कि जब हम कहते हैं कि दुनिया गोल है, तब इसका तात्पर्य कर्मों से माना जाता हैं। एल एल०बी में उम्र आधारित रोक कई बार लागू हो कर खत्म की जा चुकी है, कभी ३० वर्ष के आयु के भीतर कर सकते है, कभी ३० वर्ष के पश्चात नहीं कर सकते, फिलहाल कोई रोक नहीं, है, कई मर्तबा यह टिप्पणी सुनी होगी कि अदालतों में भीड़ अत्यधिक है, अतः कम की जानी चाहिए, माफ कीजियेगा ये प्रकरणों अथवा वादग्रस्त प्रार्थियों से नहीं उलट वकीलों से हैं, सिद्धांत अनुरूप ये कहा जाए कि कम योग्य की बलि दी जा सकती है, तो कहीं बेहतर होता सब प्रकार के विवाद को ठंडा पानी डालते हुए ऑल इंडिया बार ने ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन के आयोजन का फैसला लिया जो वर्ष में दो बार होता है, वर्तमान में पहले इसके लिए उच्च न्यायालय से पंजीयन कराना जरूरी है, जिसके बाद इस का फॉर्म भरा जा सकता है, वैसे यह एक मुक्त परीक्षा है, मुझे मेरे कई छात्र छत्राओं के माध्यम से पता चला कि यहां सब छात्र छात्राएं एक बड़े सूट केस जिसमे ब्रीफ केस से लेकर टूरिस्ट बैग तक लाये जाते है, जिसमे होता क्या है, नहीं परीक्षा केंद्र पर्यटन केंद्र नहीं है, इसमें उनके किताब और अन्य नोट्स होते है, उत्तीर्ण होने के लिए निर्धारित क्रमांक ३५-४० तक जाता है, कहिए फिर ऐसे कठोर नियम से भीड़ तो अवश्य कम होगी।

न्यायाधिपति जस्टिस ठाकुर ने केरल के बार कौंसिल के कार्यक्रम में कहा था यह पेशा पहचान के साथ धन और पुरस्कार में भी लाभ देता हैं। सही। हाल ही मे अखबार में आया था की जिला अदालत में दो वर्ष के अनुभवी वकीलो को उच्च न्यायालय में कार्य करने की अनुमति होनी चाहिए यह केवल एक सिफारिश थी हालांकि।

मैं हिंदी माध्यम की होने के वजह से हिंदी में तो मैं प्रखर हूँ अंग्रेजी और अन्य विद्यार्थी जो हिंदी के आदी नहीं है, के लिए मैने बेयर एक्ट के सहारा लिया, ग्रंथालय प्राचीन होने के कारण अधिकाधिक पुस्तके हिंदी भाषा मे उपलब्ध थी, वह भी उनके पुराने संस्करण। 

जैसे,

 16. "Undue influence" defined - (1) A contract is said to be induced by "undue influence" where the relations subsisting between the parties are such that one of the parties is in a position to dominate the will of the other and uses that position to obtain an unfair advantage over the other

१६. " असम्यक" असर की परिभाषा- (१) संविदा असम्यक असर द्वारा उत्प्रेरित कही जाती हैं जहाँ की पक्षकारो के बीच विद्यमान सम्बन्ध ऐसे हैं कि उनमें से एक पक्षकार दूसरें ओशकार की इच्छा को अधिशासित करने की स्तिथि में हैं और उस स्तिथि का उपयोग उस दूसरे पक्षकार से अऋजु फायदा अभिप्राप्त करने के लिए करता है।



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इसकी तीन आवश्यकता है

१. दो पक्षों में से एक पक्ष की स्तिथि दूसरे पक्ष के मतांतर करने की हो

२. वर्चस्व रखने वाले पक्ष अन्य पक्ष पर अन्यायपूर्ण बढ़त रख सकें

३. और वर्चस्व रखने वाले पक्ष ने अपनी प्रभुता बनाई हो।

या

विश्वास अधिकृत व्यक्ति जिसका प्रभुत्व स्थापित हो, से भय या रौब हो, जिसमे उसके इच्छाविरुद्ध कार्य करवाये गए हो।
शनै शनै विस्तार होता गया और आज मैं अनुभवों से धनी हूं।

सीमा शर्मा 

पाठकों आज के लिए इतना ही, इस श्रृंखला का उद्देश्य  ना केवल मेरे वेबसाइट का विस्तार करना है बल्कि अपने वेबसाइट के माध्यम से स्वयं के पृष्ठभूमि और अनुभव से प्रेरित करना भी है। शीघ्र ही आगामी पोस्ट प्रेषित करने का प्रयास करूंगी। धन्यवाद।


Face book link: Seema Sharma As Blogger