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मंगलवार, 20 मई 2025

मुबादला

मुबादला


बुधवार का दिन, एक बहुत बड़ा बाज़ार,

और

एक वार्षिक उत्सव के चलते, चहल पहल वाली दोपहर,
ऊपर नीले आकाश में एक स्वर्ण से रंग रूप वाले देव बड़े गौर से

आते जाते लोगों को देख रहे थे,

अनेकानेक जन आते जाते एक दूसरे के या अपने काम से मतलब रखने वाले,सैकड़ों, हजारों लोग, आकाश से यह एक समुद्र जैसे दिख रहा था, जिसके असंख्य शीश है, इनके तलों में खारा पानी ना होकर माथे से टपकता था, देव थोड़े परेशान हुए,


बेचैन हुए, उन्हें लगा, पिछले सप्ताह उनके भीतर उठने वाले ज्वालामुखी के फलस्वरूप यह भीषण गर्मी उपजी है, जिसके कारण,
उनके नेत्रों में इतनी ऊष्मा आ गई है, और नतीजतन, मानव नेत्रों में समुद्र सदृश्य वातावरण निर्मित हो गया है। और इस तापमान को कम होने में अभी सर्दी के आने के जितना वक़्त था, वह इन लोगों को थोड़ी राहत देने का सोचने लगे, भाव विह्वल होते देव को तब एक फेरी वाला हरकारे की तरह आवाज़ लगाता धरती पर जाता दिखा। वह कहता जा रहा था।

पश्चिम की ओर से आती, यह तल्खी भरी आवाज़ ने उमस में और अधिक कांटे बोने शुरू किए, ऐसे समय में बहुत सारे लोग इर्द गिर्द इकट्ठे होने लगे, उस ओर जाने लगे जहां से वह विश्राम को जायेंगे। तब वह व्यक्ति और ज़ोर ज़ोर से आवाजें देने लगा।

"बेचैनी है,

बेचैनी है,

बहुत सारी बेचैनी है,

जल्दी बोलिए,

दाम सिर्फ एक पल !,

कीमत गौर से सुनिए, सिर्फ एक पल,

सिर्फ़ एक पल,

खिदमत हमारी, पसन्द आपकी !",

वह विभिन्न दर्शनों की किताबें बेच रहा था,

फुसफुसाहट शुरू हो गई,

ऐसे रुपए तो किसी के पास नहीं थे, जिसे चुका कर वह बेचैनी ख़रीद लेते, अच्छे तमाशे की चाह में भीड़ बढ़ने लगी,

ऊपर आकाश में देव ये बढ़ती सुगबुगाहट देख खुद को रोक नहीं पाए, और ऐड लगा दी। हिनहिनाते घोड़े मानो पहिए बन गए,
इधर फर्राटे की आवाज़ से एक शानदार और चकमक गाड़ी रुकी, उस से एक संभ्रांत व्यक्ति बाहर आए। उस हरकारे की महफ़िल जहां पश्चिम का गढ़ था, वह वहां मुस्कुराते हुए चले गए।

"मुझे खरीदना नहीं है, क्या यहां, मुबादला होगा?" देव ने कहा। ढेर सारी नज़र उनसे टकरा रही थी, पर अंधेरा हो जाने के कारण कोई उन्हें देख नहीं पाया।

-प्राची शर्मा 
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सर्वाधिकार सुरक्षित 

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

Good story