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शुक्रवार, 29 सितंबर 2023

लघुकथा भाग पांच, नरमी, सलाह, और अन्य लघुकथाएं। मशविरा, रोज़ाना की एक बात,

लघुकथा (भाग पांच)
Hello Friends,
 आज पढ़े लघुकथा अंक पांच।



नरमी

"जब बात बिगड़ जाए..........", 

(बीच में टोक कर)

"उसे डांट कर सुधारना "

"अरे रे रे यह क्या कह रहे", 

"आ हां बच्चा बिगड़े तो..."


Father's discussing young generation actions

"मैंने बच्चा नहीं बात कहा था" 
"ओह माफ करना, मेरे बेटे ने मुझे बहूत परेशान कर दिया है, वैसे.. बात बिगड़े तो थोड़ा ज्यादा नर्मी से पेश आया करो" 
"तुम भी..", 
"हां शायद यही ठीक है। 

(लघुकथा)


सलाह मशविरा

"अगर शिकार के मुँह से उफ़्फ़ नहीं निकलेगा! तब भला लाचारगी का क्या भाव मिलता?" "फिर भी दोयम दर्जे के नौकरी से बाज आना चाहिए",
Two person discussing unemployment problem



"कौन जानता है दोयम कौन आ'ला कौन, फिर जितनी होशियारी दिलानी मुनासिब थी हमने दिलाई "

"तब तो ये भी बहुत है", उसने दीदे नीची

कर कहा ।

(लघुकथा)


रोज़ाना की एक बात

"चलो, अकेले ही टहलते हैं",
"भले मरुस्थल ही हो?" 
Man walking in desert


अवाक देखते हुए, उसने इशारा किया। राहगीर समझ सकता उससे पहले एक खंजर उड़ कर सीधे उसके मर्म स्थल लग गया, वह पल के पल में ढेर हो गया। तलाशी लिया गया मात्र कुछ गहने मिले, मगर पीतल के निकले, टोली के सरदार ने अफसोस से कहा, "बेकार मारा गया।"


श श श श 

"अपनी सुनाओ तुम कैसे हो",
"कुछ ठीक नहीं है",
"ओह हुआ क्या?",

" श श श .... धीरे..... मेरी सास सो रही है"

(लघुकथा)


फेसबुक

"शब्दों के धुरंधर को आज शब्द नहीं मिल रहे, बस इतना पूछा है मैंने कुछ कर के भी दिखा देते, मां के लिए जो इतनी कविताएं गढ़ते हो फेसबुक पर ।" 
बगले झांकते बड़े भाई की पत्नी ने कहा: "तुम्हारी भी तो मां है अपने साथ ले जाओ" छोटा सकपका गया।
Interview of an aged writer



अंततः अंतिम संवाद के बाद अंतिम संपत्ति को तीन तीन महीने के लिए भाग किया गया।

(लघुकथा)


लेखिका

"किसी की याद लिखवाती है हमसे

वर्ना आयु का प्रकोप ऐसा है की चार पग। चलूं तो, ऊंह ऊंह", मैं खांसने लगती हूं। पत्रकार : पिचासी की अंक और बस आपकी लेखनी सरपट दौड़ते जा रही हूं, क्या सचमुच में किसी अन्य का ही प्रभाव है?",
Mother's illness and sons


 "ऊंह वह बात ये है, ऊंह ऊंह, ऊंह " मैं अचेत हो कर गिर पड़ी, उपस्थित सभी घबरा गए, मेरे नाम का स्वर, सर्वत्र गुंजायमान था। मैं खांसते खांसते अदृश्य हाथ पकड़ कर आगे बढ़ गई।

(लघुकथा)


घी

"ये बात तो ग़लत है पर सीधी उंगली से घी न निकले तो, उंगली टेढ़ी करनी ही पड़ती है"

"हुंह"

कुछ दिन बाद

पुलिस थाने में परेशान वह एक दूसरे को ताक रहे थे किसी ने घी का डब्बा आग के ऊपर ही रख दिया था।

(लघुकथा)


पार्टनरशिप

"मैंने पूछा था? ना मैंने तुम्हें कभी नहीं पूछा, तुम जबरदस्ती गले पड़ रहे", 
"वाह! चोरी पर सीना जोरी, साथ दिया मैंने पूरा, अकेले तुम भी माल नहीं उठा सकते थे, समझे!" 
Two thief fighting before police


" अरे जाने दे जाने दे, बड़ा आया", दोनो चोरों का झगड़ा बढ़ते हुए हाथापाई की नौबत आ गई, लड़ते लड़ते वह खुद ही पुलिस के पास पहुंच गए।

(लघुकथा)

समाप्ति

पाठकों आशा है यह अंक आप सभी ने पूरा पढ़ा हो, अन्य अंक पढ़े, इसी ब्लॉग में।



©2020-2023
कॉपीराइट: सीमा शर्मा, प्राची शर्मा
सर्वाधिकार सुरक्षित।

शनिवार, 25 जुलाई 2020

श्रृंखला-वीर नारायण सिंह, First Martyr From Chhattisgarh

 क्रमवार

सम्पादित: सीमा शर्मा

वीर नारायण सिंह
१८५७ के स्वतंत्रता संग्राम में बलिदानी, शहीद वीर नारायण सिंह, सोनाखान के ज़मींदार परिवार में १७९५ में जन्मे थे, इनके पिता द्वारा अंग्रेज और भोंसला के आततायी राज्य के विरुद्ध बिंझवार आदिवासी समुदाय के मदद से १८१८-१८१९ में विद्रोह किया गया था।
१८३० में पिता के मृत्यु के बाद यह जमींदार बने  यह सहृदय, न्यायप्रिय और उद्यमी थे , नए करों के विद्रोह कर कारण रायपुर में डिप्टी कमीशनर इलियट नाराज हो गया। १८५६ में छत्तीसगढ़ भयावह सूखा पड़ा,  कसडोल व्यापारी माखन के अनाज भंडार को तुड़वा दिया। ब्रिटिश सरकार जो पहले ही भरी हुई बैठी थी अधिकारी इलियट ने वारंट निकाला, जिसके परिणामस्वरूप यह २४/०८/१८५७ को सम्बलपुर में गिरफ्तार कर लिए गये। जहां से ४ दिन बाद २८ को  तीन साथियों के साथ सुरक्षित निकल गये, जहां इनकी ५०० सैनिकों की सेना बनाई, कड़ी मुठभेड़ के बाद अंग्रेजों ने चालाकी से गिरफ्तार कर लिया और १०/१२/१८५७ को फांसी दे दी जहां "जय स्तम्भ" खड़ा है, यह रायपुर में स्वतंत्रता आंदोलन के उठाव के का कारण बना।
छत्तीसगढ़ शासन वर्ष २००१ से आदिवासी और पिछड़े वर्ग के उत्थान कार्य पर शहीद वीर नारायण सिंह सम्मान देती हैं।
वर्तमान में आदिवासियों के उत्थान की दिशा में कार्य करने वाली संस्था या व्यक्ति को ₹ २,००,००० तथा प्रशस्ति पत्र दिया जाता है।

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नाग पंचमी कल्कि जयंती

नागपंचमी

रायपुर कण्टेन्मेंट जोन होने के कारण लॉक-डाउन २८ जुलाई ,२०२० तक हैं।
लॉक-डाउन और कोरोना संक्रमण के कारण, यूं तो भक्तों की मंदिरों अन्य धार्मिक स्थलों में उपस्थिति कम हो गयी है, परन्तु जैसा आपने पिछले पोस्ट में पढ़ा था सोमवती अमावस्या और शनि देव की पूजा हेतु सीमित संख्या में भी भक्तगण मंदिरों में उपस्थित थे, जहां सारे नियमों का पालन करते हुए पूजा अर्चना सम्पूर्ण हुई।
देखिए पोस्ट :हरेली
आज नाग पंचमी के अलावा कल्कि जयंती है, पंचांग में सावन माह के शुक्ल अथवा दूसरे पक्ष के पांचवी तिथि  में नागपंचमी हर वर्ष मनाया जाता हैं। इस वर्ष यह २५ जुलाई को हैं, इस पंचमी को वासुकि नाग, तक्षक नाग और शेष नाग की पूजा की जाती है।
नीलकंठ महादेव के गले में आश्रय  लिए, मंदार पर्वत  से बंधे हुए वासुकि  नाग से देवताओ एवं दानवों  द्वारा समुद्र मंथन किया था। बिहार  के बांका जिले में वासुकीनाथ, यानि शिवजी का  मन्दिर हैं, इनका उल्लेख  रामायण एवं महाभारत में भी आता हैं।
श्री वराहपुराण में प्रासंगिक, कश्यपजी और  दक्षपुत्री कद्रू के पुत्र अनंत, वासुकि, महाबली, कम्बल, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शङ्ख, कुलिक, पापरजिल  आदि है, इनके द्वारा मनुष्यों का नित्य संहार करने से व्याकुल प्रजा का इनसे सुरक्षा हेतु ब्रह्मा के समक्ष प्रार्थना पर क्रोधित ब्रह्मा ने श्राप दिया कि उनका संहार स्वयं की माता के श्राप से होगा, स्वयं के प्रकृति से असहाय इन प्रमुख नागों के अनुरोध पर ब्रह्मा ने उनके निवास स्थान हेतु सुतल, वितल और पाताल 
लोक नियत किया, पंचमी तिथि को इस श्राप  के घटित और ब्रह्मा  द्वारा वर से कश्यपजी*  के गृह वैवस्वत मनवन्तर* के आरंभ में पुनर्जन्म  और पांडव वंशी राजा जन्मेजय के यज्ञ में दुष्ट सर्पों का नाश, एवं अपकारी और मृत्यु के निकट मनुष्यों  के भक्षण की स्वतंत्रता  से प्रसन्न  वह सभी पाताल लोक को निर्गमित हुए।
(*कश्यपजी और काश्यप भिन्न है)

(*विवस्वान:- सूर्य  (का एक नाम विवस्वान) के पुत्र मनु होने के कारण वैवस्वत; मनवन्तर:- इसका सम्बंध काल की गणना से है, जैसे, मनु तथा मनुपुत्रगण जितने समय तक सप्तद्वीप वासुमती का राज्य  भोगते हुए धर्मपूर्वक अपनी ऊर्जा का पालन कर रहे है, वह समय मन्वन्तर कहलाता है, एक मन्वन्तर अर्थ ३०,६७,२०,०००, मानव वर्ष) 

 महाराज युधिष्ठिर के जिज्ञासावश पूछे प्रश्न में श्री कृष्ण ने इस तिथि के महात्मय का वर्णन किया की ऐसा ही श्राप कालांतर में इनकी माता ने इन्हें सौंपा कार्य करने से मना करने पर  दिया था, जिससे वासुकि नाग मूर्छित हो गए ब्रह्माजी ने उनसे कहा की वह अपनी बहन का विवाह यायावर वंश के जरत्कारु से कर दे,  भविष्य में  उनसे उत्पन्न पुत्र आस्तिक, उन पाण्डववंशी राजा जनमेजय को समझा कर रुकवा  सकेगा, यही तिथि श्रावण मास शुक्ल पक्ष के पंचमी तिथि को थी, एक वर्ष में बारह पंचमी होते हैं   तथा प्रत्येक मास में अनंत, वासुकि, शेष, पद्म, कम्बल, अश्वतर, धृतराष्ट्र, शंखपाल, कालिय, तक्षक तथा पिंगल नामों को वर्णीत किया हैं, अतएव यह तिथि धन्य, प्रिय, पवित्रता और सम्पूर्ण  पापों का संहारक सिद्ध है, एवं श्रद्धापूर्वक पूर्ण करने पर बाँधवगण सद्गति प्राप्त करते हैं। श्री राम एवं उनके अनुज को नाग पाश में बांधने वाले मायावी सर्प कद्रू के पुत्र थे, जिनसे प्राणरक्षा श्रीविष्णु के वाहन गरुड़ जी ने की थी।

अन्य कथाएं

'प्र'  का अर्थ है 'प्रकृष्ट', कृति से 'सृष्टि', सृष्टि करने में जो प्रकृष्ट है उसे प्रकृति कहते है, सर्वोत्तम सत्वगुण के अर्थ में 'प्र' शब्द, मध्यम  रजोगुण के अर्थ में 'कृ', शब्द और तमोगुण के अर्थ में 'ति' शब्द है।इनके एक प्रधान अंश का नाम देवी जरत्कारू हैं, ये कश्यपजी की मानसपुत्री है; अतः मनसादेवी कहलाती है, भगवान शिव की प्रिय शिष्या हैं, नागराज शेष की बहन होने के कारण से सभी नागराज इनका सम्मान करते है, यह नाग की सवारी पर चलती है जिससे इन्हें नागेश्वरी और नागमाता कहा जाता है, प्रधान प्रधान नाग इनके साथ विराजमान रहते है, ये नागों से सुशोभित रहतीं है और नागराज इनकी स्तुति करते है यह नागलोक में निवास करती है, ये ब्रह्म चिंतन में लीन रहती हैं, श्रीहरि के पूजा में सलग्न रहती है, जरत्कारु मुनि, जो कि भगवान श्रीकृष्ण के अंश है, की पत्नी है, और महान मुनिवर आस्तिक की माता हैं।
अन्य कथाओं में तक्षक नाग ने आस्तिक मुनि को वरदान दिया कि जो व्यक्ति ऊँ आस्तिकाय नम: का जाप करेगा उसे सांप नहीं कांट सकेंगे।

गरुड़ पुराण से : क्षक नाग से राजा परीक्षित को डसने की बात सुन कर कई मन्त्रवेत्ता झाड़फूंक के लिए चले थे, जिनमें एक काश्यप नाम से मन्त्रवेत्ता थे, जो कि राजा से अपार धन मिलने की इच्छा रखते थे, उनके गुणों को जानते हुए, वह वृद्ध ब्राह्मण का वेश बना कर उनसे उनके अधीर होकर जाने का रहस्य ज्ञात किया और अपने रूप की वास्तविकता बताई और कहा कि वही तक्षक नाग है और उनके दंश से कोई नहीं बचा सकता साथ ही साथ अपनी शक्ति सिद्ध करने को कहते हुए एक हरे भरे वृक्ष को डंस कर आग जैसा जला दिया जिस पर काश्यप ने उसे फिर से अपनी बुद्धिबल से हर भरा कर दिया, तक्षक ने उससे परीक्षित को जिलाने का प्रयोजन जाना, और इच्छा से दून धन देकर विदा किया।
आगे.....

बात-बेबात में हम में से कई ने "यही तो कलयुग है", की उक्ति  सुनी होगी, कलि (ब्रह्मा के पीठ से उत्पन्न, अधर्म) के अधर्म  का शमन करने भगवान के अवतार हैं, भगवान कल्कि अश्वारूढ़, हाथ मे तलवार, धारित  किये हुए है, जो उन्हें  भगवान शंकर द्वारा वरस्वरूप प्राप्त है, का अवतरण वैशाख मास की शुक्ल  द्वादशी के  दिन सांयकाल सम्भलग्राम(वर्तमान मुरादाबाद के निकट), ब्राह्मण दंपति विष्णुयशा एवं सुमति के गृह, अधर्म का विनाश करने तथा  सत्ययुग की स्थापना करने चतुर्भुज रूप में हुआ, तब प्रजापति ब्रह्मा के प्रार्थना से वह मानव रूप में आए।
अपने अभीष्ट कार्य  सिद्धि के पश्चात वह स्वधाम को लौट गये, जहां इस उपपुराण में ये संबोधन भूतकाल को लेकर हैं, अन्य पुराण में भविष्य काल मे, जब सम्यक प्रकार से कलियुग आ जायेगा तब यह एक बहुत ऊंचे घोड़े पर चढ़ कर अपनी विशाल तलवार से म्लेच्छों से तीन रात में पृथ्वी से म्लेच्छ शून्य कर देंगे, पृथ्वी और अराजकता फैल जाएगी, सर्वत्र डाकू लूट पाट करेंगे, एक मोटी असीम धारा से जल बरसेगा, पृथ्वी, प्राणी, वृक्ष, गृह से शून्य हो जाएगी, बारह सूर्य उदय होकर के पृथ्वी को सुखा देंगे, और कलयुग समाप्त हो जाएगा।
अतः भगवान कल्कि इस कलयुग के अंत मे भी आएंगे।

 सन्दर्भ:- गीताप्रेस, गोरखपुर(उ.प्र.), द्वारा प्रकाशित,जन पत्रिका, "कल्याण", श्रीवराहपुराणांक, श्री कृष्ण संवत ५२०२, एवं वि० संवत २०४६ का "पुराणकथांक",  कल्याण संक्षिप्त ब्रह्मावैवर्त पुराण अंक।


Disclaimer:- No part of this article claims for methodical worshipping ways and it is just for informatory purpose.

सूचना:- व्याख्या का कोई भी अंश पूजा पद्धति के प्रकार से बद्ध नहीं हैं, तथा केवल जानकारी के उद्धेश्य से हैं।


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शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

श्रृंखला- Pt. Ravi Shankar Shukla, पं० रविशंकर शुक्ल

क्रमवार:-

पं● रविशंकर शुक्ल


तिलक के वाक्य "ब्रिटिश हुकूमत ताम्रपट के ऊपर पट्टा लिखा कर नहीं आई हैं", शुक्ल जी के जीवन मे परिवर्तन लाने वाली साबित हुई।

जन्म २ अगस्त, 1877, जिला:- सागर, मध्यप्रदेश,  इनकी शिक्षा सागर (प्राथमिक) से लेकर रायपुर(हाइस्कूल), जबलपुर(इन्टर) नागपुर(बी.ए), कलकत्ता (बी.ए. की परीक्षा), जबलपुर(एल एल.बी) तक हुई, वकालत १९०८ से रायपुर से किया। यह जिन चार नेताओ से प्रभावित रहे वह है श्री बालगंगाधर तिलक, छत्रपति शिवाजी, पंडित मदनमोहन मालवीय और महात्मा गाँधी।इनके सुप्रसिद्ध मूछों के कारण इन्हें लोग प्यार से बूढे काका कहते थे।ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा चलाये मुकदमे से इनके राजनीतिक विचार चरम पर पहुंच गए, गांधी जी के प्रभाव से यह सत्याग्रह आंदोलन में कूद पड़े, व वर्ष क्रमशः १९२३, १९३०, १९३२,१९४० और १९४२ में जेल गए। इन आंदोलनों के कारण वक़ील होने के सूची से इनका नाम कट गया, जो बाद में सन् १९३५ में फिर लिखा गया।

मध्यप्रदेश के एक जेल में राजनीतिक बन्दियों के अन्य सामान्य अपराधियो के भांति अंगूठे के निशान लिए जाते थे,जहां उन्होनें इसका डट कर विरोध किया, उच्च अधिकारियों से इसके गैर कानूनी होने की शिकायत करते हुए अपने बात के समर्थन हेतु कानून कुल सौ किताबों की सूची भेजी, जिसके प्रभाव से यह मामला आगे नहीं बढ़ा और डिप्टी इंसपेक्टर जनरल ने राजनीतिक बन्दियों के अंगूठे के निशान ना लिए जाने का आदेश जारी किया। पढ़ाई के बाद और राजनीतिक क्षेत्र में आने के बाद तक वह कई सरकारी नौकरियों में रहे। अकाल राहत अधिकारी रहते हुए उन्होंने पाया कि राहत बांटने वाले अधिकारी व व्यापारी इसमें घोटाला करते है, पद में रहते हुए वह अपने सामग्री भी पीड़ित बच्चों में बांट देते थे, बाद में नायब तहसीलदारी और मुंसिफी के प्रस्ताव उन्होंने ठुकरा दिया, खैरागढ़ के स्कूल में हेडमास्टर भी रहे। 
१९२६ से १९३६ तक यह रायपुर जिला परिषद के अध्यक्ष रहे, जिस अवधि में शिक्षा पर इनका बहुत जोर रहा, और बहुत से स्कूलों के संचालन भी किया, सन् १९३३ में स्वराज पार्टी के टिकट ओर वह विधान परिषद के सदस्य चुने गए, मध्यप्रदेश के पहले मन्त्री मण्डल मे शिक्षा और कृषि विभाग का कार्यभार सन् १९३७ में विभिन्न प्रान्तों के कांग्रेस सरकार में रहते हए सम्भाला।
राष्ट्रीय भावना से बनाई गई योजना "विद्या मंदिर योजना"  (छात्र- छात्राओं को स्वावलम्बी बनाने हेतु) प्रसिद्ध हुई।
हिंदी के समर्थक होने के नाते अपने मुख्यमंत्रित्व काल ने ही स्वर्गीय डॉ● रघुवीर प्रसाद से हिंदी की व्यापक शब्दावली तैयार करवाई, हिंदी तथा मराठी का द्विभाषी राज्य होने और सरकारी कार्य के लिए मान्य होने पर भी शुक्ल जी के व्यक्तित्व प्रभाव से, दोनो ही भाषा समर्थकों में कोई झगड़ा नहीं रहा।
अगस्त १९३८ में वह प्रांत के मुख्यमंत्री चुने गए और नवम्बर १९३९ तक इसी पद में रहे, १ नवम्बर १९५६ के नए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, कार्यकाल के दो महीने बाद ३१ दिसम्बर, १९५६ को  ८० वर्ष के दीर्घायु में दिल्ली में इनका स्वर्गवास हो गया। भारत छोड़ो आंदोलन में जब सभी नेता गिरफ्तार हो गये थे, तब इनकी जाती हुई कार को बम्बई की सड़क में गुस्साई भीड़ ने रोक लिया था, तब इनकी प्रसिद्ध मूंछो को देखकर एक कार्यकर्ता ने इन्हें पहचान के भीड़ से निकाला था।
वर्तमान में सामाजिक सद्भाव के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले व्यक्ति को पंडित रविशंकर शुक्ल सम्मान दिया जाता हैं, जिसमे ₹ २,००,०००, तथा एक प्रशस्ति पत्र सम्मिलित रहता है।
सन्दर्भ:- भारत के गौरव(आंठवा भाग)।

द्वारा:- पीयूष कुमार 'नरेश'


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गुरुवार, 23 जुलाई 2020

श्रृंखला- Veer Gundadhur, जानिए छत्तीसगढ़ से

सेनानी

संपादित: सीमा शर्मा

"........तुम भूल ना जाओ उनको इस लिए कही ये कहानी...."
गीत लिखा गया है भारत-चीन युद्ध के परिप्रेक्ष्य में, कुछ समय पहले मैंने यह पढा की आजादी के दिवस को कोई नहीं भूल सकता, याद रखने में आसान पासवर्ड के लिए ।
इसे विनोद ना समझे यह अंतर्कथा
 मर्मपूर्ण है।
श्रृंखला पर्वत शिखर की नहीं वैसी ही ऊंचाइयों भरे सेनानियों की आज से पन्द्रह अगस्त, २०२० तक दैनिक रूप से एक या एक से अधिक स्वतंत्रता सेनानी की लघु जानकारी दी जाएगी, अल्प समय में अधिक करने का प्रयास रहेगा:-

वीर गुण्डाधुर

सोमारू, बस्तर, ग्राम- नेत्तनार, धुर्वा जाति में जन्में यह चमत्कारिक व्यक्तित्व हैं, भूमकाल आंदोलन में इनकी सक्रियता रहीं, इससे उठा तूफान और इनके साहस का कोई सानी नहीं, फरवरी की दूसरी तारीख सन् १९१० में सम्पूर्ण बस्तर में आंदोलन हुआ, जिसका कारण अंग्रेजी सरकार की आततायी शक्तियों का प्रयोग था, शासकीय संस्थानों एवं सम्पत्तियों को निशाना बनाया गया, आंदोलन की शुरुआत पुसपाल बाजार की लूट से की गई, मूरत सिंह बक्षी, बालाप्रसाद नजीर, वीरसिंह, लाल कालन्द्री सिंह के सहायता से इन्होंने आंदोलन का जबरदस्त संचालन किया, लाल मिर्च एवं आम्र शाखाओं के प्रयोग को दारामिरी कहा जाता था जिससे सूचनाओ का आदान  प्रदान किया जाता था, इनके द्वारा अंग्रेजों के सूचना प्रणाली को ध्वस्त करने से अंग्रेज भयाक्रांत हुए, इस आंदोलन के उठाव से अंग्रेज अफसरों क्रमश: कैप्टेन गैर तथा डे ब्रेट को रायपुर से बस्तर ५०० सशस्त्र सैनिकों के साथ गए, दुर्भाग्यवश इस आंदोलन का सन् १९१० मई, तक अंग्रेजो द्वारा दमन हो गया, जिसके लिए कई निर्दोष व्यक्तियों की जान ले ली गई। आदिवासियों को मदिरापान कराके मुखबिरी करते हुए सोनु मांझी नामक विश्वासघाती ने  "वीर गुण्डाधुर" की सूचना अंग्रेजो को दे दी।
अंत तक वह अंग्रेजो के पकड़ में नहीं आये, वह गुर्रील्ला तकनीक में अभ्यस्त थे, तथा इनकी तुलना तात्या टोपे से होती है। गुण्डाधुर सम्मान से सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी को सम्मानित किया जाता है, शहीद गुण्डाधुर के प्रशंसा गीत चाव से सुने एवं सुनाए जाते है।
वर्तमान में साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले को ₹ २,००,००० की धनराशि और प्रशस्ति पत्र दिया जाता है।
                                ■◆इति◆■.

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सोमवार, 20 जुलाई 2020

हरेली, जानिए छत्तीसगढ़ से, Hareli from Chhattisgarh

हरेली
संपादित: सीमा शर्मा

अनुक्रमणिका 

१ हरेली का परिचय 

२ प्रक्रिया 

३ अद्यतन 

हरेली
कृषकों का मनपसन्द त्यौहार हैं, वर्तमान समय में आधुनिक उपकरणों के सहायता से यह आर्थिक दृष्टिकोण से लाभदायक हैं, कृषि देवता बलराम के हाथ मे सुशोभित हल इसे समीचीन बनाता हैं, पारिवारिक व्यवसाय हेतु भी यह अच्छा विकल्प हैं। अधिकाधिक औद्योगिकीकरण, शहरीकरण से कृषि की महत्ता अत्यधिक हैं। यह कृषि कार्य की समाप्ति का द्योतक है। हरेली के समय किसान रोपाई-बियासी जैसे कृषि कार्यों से निवृत्त हो जाते हैं।
इस हरेली में सोमवती अमावस्या और स्नान दान श्रावण अमावस्या का विशेष संयोग है।
हरेली अथवा हरियाली, श्रावण अमावस्या, मास के आरंभ में यह लोकप्रिय, त्योहार छत्तीसगढ़ में धूमधाम से मनाया जाता है,
कृषकों के लिए इस दिवस का अर्थ, हरियाली, कृषि संपदा, एवं खेती खलिहान से है. खेती उपकरणों की पूजा की जाती है।



 इस दिन फसल की पूजा की जाती हैं, घर के बाहर, गाड़ियों में, नीम की पत्ते डालियों को सजाया जाता है , यह कीटों से रक्षा करता है, (दाद, खुजली, घाव, विष से इसका लेप बचाव करता है,  खड़ी फ़सलो तथा सब्ज़ियों में नीम तेल के घोल का छिड़काव टिड्डियों के प्रकोप से बचा सकता है) घरों में चावल आटे का चीला और गेहूं  आटे और गुड़ का गुलगुला बनाया जाता है, यह दिवस तंत्र साधना के लिए भी माना जाता है, गेड़ी का खेल खेला जाता है, नगरों में भी कुल्हाड़ी, खुरपा, कुदाली, सब्बल, गैती इत्यादि की पूजा की जाती है।
ग्रामीण अपने घरों में गाय, बैल, भैंस, आदि सभी को अंडी की पत्ती में गुड़ या नमक मिलाकर खिलाते है। ऐसा माना जाता है कि इसके उपयोग से पशुधन वर्षा ऋतु में उत्पन्न होने वाली बीमारियों से बच जाते है। इससे उनके शरीर की रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ती है

पारंपरिक उपकरणों की पूजा तो होती ही है, आधुनिक समय में विभिन्न पद्धितियों की उपयोगिता भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है, जैसे की, हाल ही में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना स्वैच्छिक हुआ हैं,
कृषि उपकरण के साथ फ़सलो से सम्बंधित आर्थिक उपबन्ध महत्वपूर्ण है। छत्तीसगढ़ में गोधन न्याय योजना की पहल अनुसार ₹ २ किलो गोबर क्रय करेगी, जिससे जैविक खाद का निर्माण होगा और रासायनिक खादों से मुक्ति मिलेगी।

"अद्यतन"

"श्रद्धालुओं ने सोमवती अमावस्या का व्रत रखा और पूजा अर्चना की, किसान मास्क पहने खेत खलिहान में कृषि औजार, गेड़ी आदि की पूजा की, सोमवार की सुबह से भगवान शिव के साथ ही शनिदेव की पूजा अर्चना श्रद्धालुओं ने की । घर-घर कृषि औजार नांगर, कुदाली, फावड़ा सहित खेती-बाड़ी में काम मे आने वाले औजारों के साथ बांस से बनी गेड़ी की पूजा की, गुड़ के बने व्यंजन के साथ चीला, फरा, गुलगुला भजिया, सोहारी, खीर आदि का भोग अर्पित किया गया, साथ ही साथ बैलों गायों की पूजा अर्चना कर के आटे की लोंदी में जंगल से लाये हुए औषधि के पत्ते खिलाये। गांव के घरों के दीवारों में गोबर से श्री हनुमान जी के चित्र बनाये गए ताकि भूत प्रेत प्रवेश ना करे।" -  हिंदी समाचार पत्रनवभारत- राजधानी, 21 जुलाई, 2020,
            रायपुर, छत्तीसगढ़


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रविवार, 19 जुलाई 2020

व्यक्तित्व, डॉ. खूबचंद बघेल, Dr. Khoobchand Baghel

डॉ● खूबचंद बघेल
Dr. Khoobchand Baghel


सम्पादित: सीमा शर्मा

आज जन्मतिथि। १९/०७/२०२०
अनुक्रमणिका 
१ लघु परिचय(डॉ० खूबचंद बघेल)
२ चित्र परिचय 
३ साहित्य परिचय 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं चिकित्सक छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वप्नद्रष्टा डॉ● खूबचंद बघेल का जन्म १९ जुलाई, १९०० को ग्राम पथरी(सिलयारी)जिला रायपुर छत्तीसगढ़ में पिता श्री जोधवन प्रसाद एवं माता श्रीमती केकती बाई के घर हुआ, १२० जन्मतिथि में डॉ● खूबचंद बघेल जयंती मनाई जाएगी।
कुछ प्रासंगिक:-
महात्मा गांधी से प्रभावित होकर डॉक्टर बघेल असहयोग आंदोलन में भाग लेते हुए स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े, एवं सन् १९३१ में शासकीय पद का त्याग करके नमक सत्याग्रह में. शामिल हुए। सन् १९४० में उन्हें स्वतंत्र, मुहिम में सक्रियता के लिए। कारावास हुआ, बाद में भारत छोड़ो आंदोलन में जुटने से उन्हें ढाई वर्ष का कारावास हुआ, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी छत्तीसगढ़ के सच्चे सपूत की तपस्या पूरी नही हुई एवं वह कृषि उद्योग के छत्तीसगढ़ी के उत्थान में सर्वस्व दे दिया।


डॉ बघेल की शुरआती शिक्षा-दीक्षा गृह ग्राम के पश्चात रायपुर में हुई, जिसके पश्चात उन्होंने  १९२५ में  नागपुर से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की, जिसके पश्चात वह सहायक चिकित्सा अधिकारी के बतौर पदस्थ हुए। स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए यह कांग्रेस में शामिल हुए।
१९५१ से १९६२ तक यह विधायक रहे, तथा १९६७ में राज्यसभा सांसद।
डॉ. खूबचंद बघेल के राजनीतिक जीवन की शुरुआत पं० रविशंकर शुक्ल के समकालीन हुई, जब पं० रविशंकर शुक्ल मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे वह स्वास्थ्य विभाग में संसदीय सचिव थे. कुछ मतभेदों के उपजने से मंत्री डॉ० हसन के साथ इन्होंने पद त्याग दिया छत्तीसगढ़ राज्य के मांग हेतु यह अड़े रहे, कुछ समय बाद पं० राविशंकर शुक्ल के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने में इन्होंने सहयोग किया जिसके बाद यह किसान मजदूर पार्टी के समर्थक थे, तब के समय यह कांग्रेस पार्टी का खुल कर विरोध करते थे जिसका मुख्य कारण छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण में सहयोग न करना था, किसान मजदूर पार्टी १९६३ में बैतूल के एक सम्मेलन में प्रजा समाजवादी पार्टी से विलय हो गयी।
छत्तीसगढ़ के चहुंओर उत्थान के इच्छित डॉ• बघेल ने छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य के उत्थान के लिए लोक कला के उत्थान के लिए भ्रात संघ का निर्माण किया, वर्तमान में डॉ• बघेल की प्रतिमा फूल चौके, रायपुर में स्थित है, राज्य द्वारा संचालित 'डॉ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य योजना ११५ रोगों से सुरक्षा के लिए शासकीय चिकित्सालयों में आरक्षित है।

कृषि कार्य एवं कृषि उद्योग के उत्थान में  प्रतिवर्ष डॉ● खूबचंद बघेल कृषक रत्न सम्मान प्रदाय किया जाता है। वह उच्च कोटि के राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ कुरीतियों को जड़ से  समाप्त करने में विश्वास रखते थे उनके साहित्य से गोचर होता है कि उनके  दृष्टि से वह विषम परिस्थितियों  को उरेकित करती  हैं और साहित्य से ज्वलंत समस्याओं को भी सुलझाया जा सकता है। 

भल नइये रइपुर मां ककरो, इंहा में फोकट आयेंव।

करिया कुरता वाले मन के दुवार फोकट आयेंव।

जातिगत आधार पर भोजन करने से रोक ना हो इसलिए उन्होंने "पंक्ति तोड़ो" की मुहिम चलाई। सन् १९५६, २८ जनवरी को राजनांदगांव में उन्होंने छत्तीसगढ़ महासभा की स्थापना की पृथक छत्तीसगढ़ के मांग के साथ स्वहित की ना सोचते हुए मंत्रिमंडल से पृथक छत्तीसगढ़ की मांग न स्वीकार करने के कारण त्यागपत्र दिया,   जिसके कारण, इन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। 

साहब बरोबर दूझन डउका मन मोला फोकट रोक लिन।

तब दस रूपिया के बल्दा मोला-कोरकागज देदिन।

कहूं मैं होतेंव इंहा के मालिक....ला मोर मन ला।

चमड़ी चमड़ी उकर उढेंरतेंव सोरियातेंव बदमाश ला।

जिसके बाद यह स्वतंत्र रूप से पृथक छत्तीसगढ़ की मांग पर कार्य करने लगे जैसे पर्चे बंटवाने का, आंदोलन करने का , लेख लिखना। पृथक छत्तीसगढ़ की मांग, राजनीतिक सामाजिक एवं आर्थिक शोषण व उपेक्षा के उत्तर में था।

२२ फरवरी , १९६९ को यह तारा  अस्तांचल में चला गया।

वर्तमान में कृषि के क्षेत्र में सर्वाधिक उत्पादन करने वाले व्यक्ति को ₹ २,००,००० की धनराशि, पुरूस्कृत की जाती हैं।

अच्छा अब मैं जाथंव भाई, नई सपना में रईपुर आवंव।

अतेक इज्जत होगे तऊन ला कहुं ला में नई बतावंव।

-करमछड़हा




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