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मंगलवार, 11 अगस्त 2020

Leading towards date of freedom, Lala Lajpat Rai, लाला जी

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पंजाब केसरी

सम्पादित:- सीमा शर्मा

"मेंरी छाती पर हुआ एक-एक वार  भारत मैं ब्रिटिश साम्राज्य वाद की काठी में एक-एक कील साबित होगी",  यह कहने वाले लाला  लाजपतराय का जन्म, २८ जनवरी, १८६५ में गाँव ढुड्ढी, ननिहाल में हुआ, कस्बा जगरांव, जिला  लुधियाना पंजाब, के व्यापार मंंडी में इनके दादा की दुकान थी और इनके पिता स्कूल में शिक्षक थे।
इन्होंने साहित्य और समाज दोनो की विद्यार्थी जीवन से ही भरपूर सेवा की, यह हिसार में ही वकालत की प्रैक्टिस करने लगे, जिसमे इन्हें इनकी प्रखर बुद्धि से और निधड़क बोलने से सफलता प्राप्त हुई,  इनके पिताजी स्वामी दयानंद सरस्वती के अनुयायी थे, लाला लाजपत राय ने एक शाखा हिसार में आर्य समाज मे स्थापित की जिसका मुख्य कार्य अछूतोद्धार था, जाति के बड़े अंग को अछूत माने जाने को यह अन्याय मानते हूऐ इन्होंंने कांगड़ा और संयुक्त प्रान्त के पहाड़ी इलाके (हिमालय, शिवालिक, विध्यांचल, कैमुर) में शिक्षा का प्रचार किया, जहां इनके द्वारा दिए गए ४०,००० रुपये से पाठशालाएँ खोली गई। अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से अप्रसन्न हो कर लाला हंसराज के सहयोग से इन्होंने लाहौर में दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज स्थापित किये, (पंजाब में आर्य समाज का सर्वाधिक विस्तार हुआ था जिसने लाला हंसराज और लाला लाजपत राय जैसे राष्ट्रवादियों को जन्मा था), यह तीन साल तक म्युनिसिपल बोर्ड में अवैतनिक मंत्री भी रहे, जहां इनके कार्य से सभी प्रसन्न रहते थे।
बंगाल मध्यप्रान्त राजपूताने में पड़े अकाल के कारण कई अनाथ बच्चों को फिरोजपुर और लाहौर के अनाथालयों में ईसाई पादरी ज़बरदस्ती धर्मांतरण करा रहे थे, अकाल पीड़ितों का पहले ही जिम्मा ले चूके लालाजी उनको अन्न पहुंचा रहे थे एवम इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठायी। मिंटगुमरी में हो रहे किसान आंदोलन, एक पत्रिका के संपादक को कारागार में डालने से इनका विरोध देख के छल से डिप्टी कमिश्नर ने कचहरी जाते समय इनको गिरफ्तार कर लिया।
मांडले जेल में १८ महीने रहते हुए इन्होंने महान अशोक, श्रीकृष्ण और उनकी शिक्षा, छत्रपति शिवाजी नामक पुस्तकें लिखी। 
यह उर्दू भाषा मे लिखते थे, जिसमे इन्होंने मैजिनी और गैरीबाल्डी जैसे देशभक्तों की जीवनियां लिखी, १९१४ इंग्लैंड में प्रतिनियुक्ति में जाने के बाद यह जापान गये, फिर लौटने के पहले ही महायुद्ध शुरू हुआ और भारत सरकार ने आने की इजाजत नहीं दी, जिसके बाद यह अमेरिका गए जहाँ इनकी लिखी पुस्तक यंग इंडिया सुप्रसिद्ध रही, वापस लौटने पर यह कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में यह प्रधान चुने गए, जिसके बाद यह फिर गिरफ्तार कर लिए गए जिसके बाद यह अस्वस्थ रहने लगे, इन्होंने सर्वेन्ट्स ऑफ पीपल सोसाइटी स्थापित की, लाहौर में तिलक स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स स्थापित की, सदा देशहित को सर्वोपरी मानने वाले लालाजी का निधन साइमन कमीशन का विरोध करते समय ब्रिटिश पुलिस के हिंसामय हो कर लाठी से इनके छाती में वार किया, जिससे इनको छाती में सूजन हो गयी और बुखार में इसी रोग से सन् १९२८, १७ नवम्बर को हुआ।

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