ब्रह्मवैवर्त पुराण
सामान्य परिचय
अनुक्रमणिका
१ स्रोत
२बालक/बालिका के लिए
३ पिता /माता के लिए
४ स्त्री के लिए
५पुरुष के लिए
६अपने सम्बन्धियों को
७ मान्यता
८ मित्रता कैसी होनी चाहिए
ब्रह्नमवैवर्त पुराण में वर्णित
बालक/बालिका के लिये
पिता को
• तात
• जनक
माता(गर्भधारिणी)
• अम्बा
• जननी
• प्रसु
पिता के पिता को
• पितामह
पितामह के पिता को
• प्रपितामह
अन्य को सगोत्र
माता के पितामह को
• मातामह
मातामह के पिता को
• प्रमातामह
प्रमातामह के पिता को
• वृद्धमातामह
पिता की माता
• पितामही
पिता की पितामही(पितामही की सास)
• वृद्धप्रपितामही
माता की माता
• मातामही
(माता के समान ही पूजित होती हैं।)
प्रमातामह की पत्नी
• प्रमातामही
प्रमातामह के पिता की पत्नी
• वृद्धप्रमातामही(प्रमातामह की माँ)
पितृव्य
• ताऊ, चाचा
माता के भाई को
• मातुल(मामा)
पिता की बहन को
• पितृष्वसा (फुआ)
माता की बहन को
• मातृष्वसा(मासुरी या मौसी)
पिता/माता के लिये
बेटे को
• सुनु, तनय, पुत्र, दायाद, आत्मज
बेटी को
• दुहिता, कन्या, आत्मजा
पुत्र की पत्नी
• वधु(बहु)
पुत्री का पति
• जमाता(दामाद)
स्त्री के लिये
पति के अर्थ में
• प्रिय
• भर्ता
• स्वामी
पुरुष के लिये
पत्नी के अर्थ में
• भार्या
• जाया
• प्रिया
• कांता
स्त्री के लिए
पति के भाई को
• देवर
पति की बहन को
• ननान्दा(ननद)
पति के पिता को
• श्वशुर
पति की माता को
• श्वश्रु
पत्नी के भाई
• श्यालक
पत्नी की बहन
• श्यालिका
पत्नी के पिता को
• श्वशुर
अपने सम्बन्धियों को
सगे भाई को
• सोदर
सगी बहन को
• सोदरा या सहोदरा
बहन के बेटे को
• भगिनेय(भगिना या भांजा)
भाई के बेटे को
• भ्रातृज(भतीजा)
बहनोई को
• आबुत्त(भगनिकान्त, भागिनिपति)
साली का पति
• साढ़ू(भाई, क्योंकि दोनों के ससुर एक ही है)
मान्यता
श्वशुर को पिता ही जानना चाहिए(पत्नी/पति का पिता)
मनुष्यो के पांच पिता कौन हैं
• अन्नदाता
• भय से रक्षा करने वाला
• पत्नी/पति का पिता
• विद्यादाता
• जन्मदाता
चौदह माताएं
• अन्नदाता की पत्नी
• बहन
• गुरुपत्नी
• माता
• सौतेली माता(विमाता)
• बेटी
• बहु
• मातामही
• पितामही
• श्वश्रू
• माता की बहन
• पिता की बहन
• चाची
• मामी
पुत्र के पुत्र को
• पौत्र, उसका पुत्र
• प्रपौत्र, उसका पुत्र
• वंशज, कुलज
कन्या के पुत्र
• दौहित्र,उसके पुत्र
• बांधव
गुरुपुत्र तथा भाई
• पोष्य एवम परमबांधव
गुरुपुत्री तथा बहन
• पोष्या(मातृतुल्य)
पुत्र के गुरु को
• भ्राता, पोष्य, सुस्निग्ध माना जाता है
पुत्र के श्वशुर
• भाई, या वैवाहिक बंधु, बेटी के श्वशुर को भाई या वैवाहिक बन्धु माना जाता है
गुरु और श्वशुर के भाइयों का सम्बंध गुरुतुल्य हैं।
जिसके साथ बंधुत्व( भाई से व्यवहार) हो वह मित्र हैं,
मित्रता कैसी होनी चाहिए
मित्र कौन है
• जो सुख देने वाला हो
शत्रु कौन हैं
• जो दुख देने वाला है
मित्रता का सम्बंध प्रीतिजनित है, वह परम् दुर्लभ है, मित्र की माता मित्र की पत्नी ये माता तुल्य है। मित्र के भाई और पिता मनुष्यों के लिए चाचा और ताऊ के समान आदरणीय माने जाते हैं।
सन्दर्भ:- कल्याण वर्ष ३७, संख्या १, ब्रह्मवैवर्त पुराण अंक
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