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शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

गांधी जयंती (क्रमशः)

बापू 

द्वितीय

बापू के प्रिय भजन**
हरि, तुम हरो जन की भीर।
द्रौपदी की लाज राखी, तुम बढ़ायो चीर।
भक्त कारन रूप नरहरि, धरयो आप सरीर।
हरिनकश्यप मार लीन्हो, धरयो नाहिन धीर,
बूड़ते गजराज राख्यो, कियो बाहर नीर।
दासि मीरां लाल गिरधर, दुख जहां तहां पीर।

गांधी जी के एकादश व्रत**

जिसमे सत्य को परमेश्वर कहा, सत्य आग्रह सत्य विचार, सत्य वाणी और सत्य कर्म, अहिंसा: बिना अहिंसा के सत्य की खोज असंभव हैं, ब्रह्मचर्य: न केवल जनेन्द्रिय बल्कि सर्वेन्द्रीय पर नियंत्रण, अस्वाद: भोजन शरीर पोषण के लिए होना चाहिए, अस्तेय: (चोरी न करना) दूसरे की वस्तु लेने के अलावा आवश्यकता से अधिक संग्रह करना चोरी है, अपरिग्रह: धन संबंधी न होकर विचार और इच्छापूर्वक परिग्रह कम करना, इसके कम होने से सुख और सच्चा संतोष बढ़ता है, सेव शक्ति बढ़ती है, अभय: जो सत्यपरायण रहे वह न तो जात बिरादरी से डरे न सरकार से चोर बीमारी मौत से न डरे, न किसी के बुरा मानने से डरे, अस्पृश्यता निवारण: प्रत्येक हिन्दू का धर्म कर्तव्य हैं कि छुआछूत का निवारण करे, शरीर श्रम: बिना कारण दुसरो से सेवा न लेते हुए जिनका शरीर खुद काम ले सकता हैं, सारे काम खुद करना चाहिए, सर्वधर्म समभाव: सभी धर्मों का बराबर सम्मान करना चाहिए तथा प्रार्थना करनी चाहिए कि सभी धर्मों के दोष दूर हो जाए, स्वदेशी: अपने आसपास रहने वालों की सेवा में लीन होना स्वदेशी धर्म हैं, जो निकट के लोगो के सेवा छोड़ कर दूर के लोगो की सेवा करने दौड़ता है वह स्वदेश भंग करता हैं।

रचनात्मक कार्यक्रम

रचनात्मक कार्यक्रम को सत्य और अहिंसात्मक साधनों द्वारा पूर्ण करना स्वराज्य की रचना कहा जा सकता है। ....उसके एक एक अंग पर विचार करें।

कौमी एकता- एकता का मतलब सिर्फ राजनैतिक एकता नहीं है।.... सच्चे मानी तो हैं वह दिली दोस्ती, जो तोड़े न टूटे। इस तरह की एकता पैदा करने के लिए सबसे पहली जरूरत इस बात की है कि कांग्रेसजन, वे किसी भी धर्म के मानने वाले हों, अपने को हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी- सभी कौमो का नुमाइंदा समझें।

अस्पृश्यता निवारण- हरिजनों के मामले में तो हरेक हिन्दू को यह समझना चाहिए कि हरिजनों का काम उसका अपना काम है।

मद्य निषेध- अफीम, शराब, गांजा वगैरा चीजो के व्यसन में फंसे हुए अपने करोड़ो भाई बहनों के भविष्य को सरकार की मेहरबानी या मर्जी पर झूलता नहीं छोड़ सकते। इन व्यसनों के पंजे में फंसे हुए लोगो को छुड़ाने के उपाय निकालने होंगे।

खादी- खादी का मतलब है देश के सभी लोगो की आर्थिक स्वतंत्रता और महानता का आरंभ। खादी में जो चीजें समाई हुई हैं, उन सब के साथ खादी को अपनाना चाहिए। खादी के एक मतलब यह है कि हममें से हरेक को सम्पूर्ण स्वदेशी की भावना बढ़ानी और टिकानी चाहिए।

दूसरे ग्रामोद्योग- हाथ से पीसना, हाथ से कूटना और पछोरना, साबुन बनाना, कागज बनाना, दियासलाई बनाना, चमड़ा बनाना, तेल पेरना और इस तरह के दूसरे सामाजिक जीवन के लिए जरूरी और महत्व के धंधों के बिना गांवों की आर्थिक रचना सम्पूर्ण नहीं हो सकती।

गांवों की सफाई: देश मे जगह जगह सुहावने और मनभावने छोटे-छोटे गांवों के बदले हमें घूरे जैसे गांव देखने को मिलते हैं।.....हमारा फर्ज हो जाता है कि गांवों को सब तरह से सफाई के नमूने बनावें।

बुनियादी तालीम- बुनियादी तालीम हिंदुस्तान के तमाम बच्चों को, वे गांवों में रहने वाले हो या शहरों के, हिंदुस्तान के सभी श्रेष्ठ तत्वों के साथ जोड़ देती है। यह तालीम बालक के मन और शरीर दोनो का विकास करती हैं।

प्रौढ़ शिक्षा- बड़ी उम्र के अपने देशवासियों को जबानी, यानी सीधी बातचीत द्वारा सच्ची राजनैतिक शिक्षा दी जाय।

आरोग्य के नियमो की शिक्षा- हमारे देश की दूसरे देशों से बढ़ी-चढ़ी मृत्यु संख्या का ज्यादातर कारण निश्चय ही गरीबी है, जो देशवासियों के शरीर को कुरेदकर खा रही है; लेकिन अगर उनको तन्दरूस्ती के नियमो की ठीक-ठीक तालीम दी जाय, तो उसमें बहुत कमी की जा सकती है। जब बीमार पड़े तब  अच्छे होने के लिए अपने साधनों की मर्यादा के अनुसार प्राकृतिक चिकित्सा करें।

प्रांतीय भाषाएं- हिंदुस्तान की महान भाषाओं की अवगणना की वजह से हिंदुस्तान को बेहद नुकसान हुआ है, उसका कोई अंदाजा हम नहीं कर सकते।.....जब तक जनसाधारण को अपनी बोली में लड़ाई के हर पहलू और कदम को अच्छी तरह से नहीं समझाया जाता, तब तक उनसे यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे उसमे हाथ बटायेंगे।

राष्ट्रभाषा- समूचे हिंदुस्तान के साथ व्यवहार करने के लिए हमको भारतीय भाषाओं में से एक ऐसी भाषा की जरूरत है, जिसे आज ज्यादा-से-ज्यादा तदाद में लोग जानते औऱ समझते हों, बाकी के लोग जिसे झट सीख सकें और वह भाषा हिन्दी (हिंदुस्तानी) ही हो सकती है।

आर्थिक समानता- आर्थिक समानता के लिए काम करने का मतलब है पूंजी और मजदूरों के बीच के झगड़ों को हमेशा के लिए मिटा देना।....अगर धनवान लोग अपने धन को और उसके कारण मिलने वाली सत्ता को खुद राजी-खुशी से छोड़कर और सबक कल्याण के लिए सबों के साथ मिलकर बरतने को तैयार न होंगे, तो यह सच समझिए कि हमारे मुल्क में  हिंसक और खूंखार क्रांति हुए बिना नहीं रहेगी।

किसान- स्वराज्य की इमारत एक जबरदस्त चीज़ है, जिसे बनाने में अस्सी हजार करोड़ हाथों के काम है। इन बनाने वालों में किसानों की तादाद सबसे बड़ी हैं। सच तो यह है कि की स्वराज्य की इमारत बनाने वालों में ज्यादातर(करीब ८० फीसदी)  वे ही लोग हैं, इसलिए किसान ही कांग्रेस है, ऐसी हालत पैदा होनी चाहिए।

मजदूर- अहमदाबाद के मजदूर-संघ का नाम समूचे हिंदुस्तान के लिए अनुकरणीय है क्योंकि वह अशुद्ध हिंसा की बुनियाद पर खड़ा है।... मेरा बस चले तो हिंदुस्तान की सब मजदूर संस्थाओं का संचालन अहमदाबाद के मजदूर-संघ की नीति पर करूं।

आदिवासी- आदिवासियों की सेवा भी रचनात्मक कार्यक्रम का एक अंग है ।....समूचे हिंदुस्तान में आदिवासियों की आबादी दो करोड़ है।.... उनके लिए कई सेवक काम कर रहे हैं फिर भी उनकी संख्या काफी नहीं है।

कुष्ठ रोगी- यह एक बदनाम शब्द है। फिर हममें जो सबसे श्रेष्ठ या बढ़े- चढ़े है, उन्ही की तरह कुष्ठ रोगी भी हमारे समाज के अंग हैं। पर हकीकत यह है कि जिन कुष्ठ- रोगियों को सार-संभाल कि सनसे ज्यादा जरूरत है,  उन्हीं को हमारे यहां जान-बूझकर उपेक्षा की जाती है।

विद्यार्थी- विद्यार्थी भविष्य की आशा है।....इन्हीं नौजवान स्त्रियों और पुरुषों में तो राष्ट्र के भावी नेता तैयार होने वाले हैं विद्यार्थियों को दल बंदी वाली राजनीति में कभी शामिल नहीं होना चाहिए उन्हें   राजनैतिक हड़तालें नहीं करनी चाहिए। पहनने-ओढ़ने के लिए वे हमेशा खादी का इस्तेमाल करें।

स्त्रियां- स्त्री को अपना मित्र या साथी मानने के बदले  पुरुष ने अपने को उसका स्वामी माना है। कांग्रेस वालों का यह खास कर्तव्य है  कि हिंदुस्तान की स्त्रियों का इस गिरी हुई हालत से हाथ पकड़ कर ऊपर उठावें।

गो-सेवा-  गोरक्षा मुझे बहुत प्रिय है। मुझसे कोई  पूछे कि हिंदू धर्म का बड़े-से-बड़ा ब्रह्म स्वरूप क्या है तो मैं गौ रक्षा बताऊंगा। मुझे वर्षों से  दिख रहा है कि हम इस धर्म को भूल गए हैं। दुनिया में ऐसा कोई देश मैंने नहीं देखा, जहां गाय के वंश की, हिंदुस्तान जैसी लावारिस हालत हो।

‘इस अपढ़, अनगढ़ लेकिन निश्चयी किसान ने मुझे जीत लिया.’

अपने सत्य के प्रयोग में गांधी जी ने इस पर लिखा है।***

जबरन नील की खेती कराए जाने से किसानों चंपारण, बिहार के  पश्चिमोत्तर में स्थित, किसान खाद्यान्न के स्थान पर नील के खेती को मजबूर थे, लखनऊ अधिवेशन में मिले एक किसान राजकुमार शुक्ल ने महात्मा गांधी से आग्रह किया कि वह स्वयं वहां आकर का हाल देखे, पहले इस पर प्रताप के संपादक श्री गणेशशंकर विद्यार्थी नील की खेती पर कई ज्वलंत लेख लिख चुके थे, कांग्रेस ने लखनऊ अधिवेशन में प्रस्ताव पारित किया उससे भी राजकुमार शुक्ल सन्तुष्ट नहीं हुए और गांधी जी को वहाँ स्वयं चल के जाने का आग्रह किया।

१० अप्रैल १९१७ को वहाँ पहुंचे, फिर जो हुआ वो इतिहास है, अफ्रीका में अपनाए सत्य और अहिंसा के हथियार गांधीजी ने पहली बार भारत मे प्रयोग किया, पीड़ित किसानों के बयान कलमबद्ध किये गए , ध्यान रहे इसमें कांग्रेस की सहायता नहीं ली गयी थी, जनता का जबरदस्त सहयोग था। चार माह के बाद यह रंग ले आया, और धीरे धीरे १३५ साल पुरानी नील की खेती बन्द हो गयी। 

वें जमींदार निलहे साहब के नाम से प्रसिद्ध थे। जब गांधी जी १९१७ मे वहां जांच करने गए तो उन्हें सरकारी सूचना मिली कि वह चंपारण से निकल जाए, गांधी जी ने इनकार कर दिया, अंग्रेजी सरकार ने उनपर मुकदमा चलाया, गांधी जी ने निधड़क सच कह कर स्वीकार किया कि सरकारी आदेश की जानबूझकर उन्होंने तामीली नहीं की, सरकार पर  उनके सत्याग्रह का असर हुआ और उनकी शिकायतें सुनी गई।****






                                                                                      

**गांधी डायरी, सस्ता साहित्य मण्डल

***विकिपीडिया

****भारत के गौरव (पांचवा भाग)

                                                                                       

क्रमशः......

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2 टिप्‍पणियां:

Gudiya Sharma ने कहा…

👍🙂

Ashu Mishra ने कहा…

बहुत खूब, अगले अंक का इंतेजार रहेगा