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शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

गोष्ठी- प्रेमचंद, Munshi Premchand

व्यक्तित्व

प्रेमचंद

सम्पादित: सीमा शर्मा

कोई ज्वलन्त समस्या हो या आमूलचूल बदलाव, जिस पेशिनगोई ने पहले ही अपनी कह दी हो वह है प्रेमचंद, भारत के गौरव में एक पाठ इनके जिंदगी पर है, एक हिंदी पाठ मेरे स्कूल की किताब में थी, प्रेमचन्द, एक ऐसे दिया रहे है जिसकी बाती तो काफी लंबी थी पर जलने को तेल कम था।
प्रेमचंद को पढ़ने के बाद जब बाकी की दुनिया की ओर देखती हूँ तो सारी दुनिया ही उनसे मोहग्रस्त मालूम पड़ती हैं।
पहले पाठ्यक्रम फिर दुनिया में इन कहानियों को पढ़ा जाता है, वैसे, काफी हद तक ये सम्पादित कर दिये जाते है। इनकी पहली कहानी 'पंच परमेश्वर' है। और अंतिम कफ़न, सामाजिक सरंचना इंगित करती हुई नमक का दरोगा, बड़े घर की बेटी, रानी सारंध, आत्माराम, दुर्गा का मंदिर, वज्रपात, पूस की रात, लाल फीता या मजिस्ट्रेट का इस्तीफा आदि कहानियां , यह उपन्यास मंगलसूत्र लिख ही रहे थे, पर यह अपूर्ण रह गई।


उत्तर प्रदेश में काशी से चार मील दूर लमही में ३१, जुलाई, १८८० को धनपत राय, अजायब लाल, जो डाकखाने में क्लर्क थे के घर जन्में थे, इन्होंने बी.ए., तक कि शिक्षा प्राप्त की यह वकालत भी पढ़ना चाहते थे, इनकी शादी १३-१४ वर्ष में हो गईं थी, वह इनसे उम्र में भी बड़ी थी, पति से भी झगड़ा करती थी और सास से भी, इस लिए ये शादी अधिक समय तक टिक नहीं पाई, और दूसरी शादी शिवरानी देवी से, कुछ बहुत जानी जाने वाली बातों में बाल्यकाल में माता की मृत्यु, विमाता से क्षोभ और उनके पुत्र के स्वयं काबिल होने तक उन दोनों की जिम्मेदारी उठाने की, या एक बाल-विधवा, से पुनर्विवाह की अथवा कई पत्रिकाओं के सम्पादन की जिसमे माधुरी और हंस आते है,  गांधीजी के गोरखपुर में दिए भाषण से असहयोग में सहयोग हेतु न केवल सरकारी नौकरी से त्यागपत्र बल्कि देशप्रेमियों को अपने घर मे एक मिलने के लिए विश्वासप्रद स्थान देना,  हालांकि इनकी एक पांच कहानियों का संग्रह सोजेवतन, अंग्रेजो ने ज़ब्त की बस देशप्रेम में जेलयात्रा की इनकी इच्छा अधूरी रह गई।  इनकी उन्नति की असीम अभिलाषा गांव के उन्नति से शुरू होती है, और वह समाजवादी विचारधारा के पुजारी थे, दरिद्रता, भूख, अशिक्षा, रूढ़िवादिता, सामाजिक शोषण, अंध विश्वास, और बेचारगियों को साहित्य में पिरोना, अब सभी ही प्रशंसको को कंठस्थ है, 'निर्मला', 'गोदान','कर्मभूमि', रंगभूमि', प्रेमाश्रम(हिंदी का पहला राजनीतिक उपन्यास)
इनके चाचा इनको प्यार से नवाब कह के बुलाते थे इसलिए शुरुआत में नवाब राय के नाम से यह रचना करने लगे, पर परतंत्रता के जमाने मे अंग्रेजो को यह रास नहीं आया, कालांतर में यह प्रेमचंद के नाम से रचना करने लगे, जहाँ कुछ रचनाओं पर फिल्में बनी है, फ़िल्म देवदास से मुतास्सिर, सेवासदन को फिल्माने यह बम्बई गये थे, पर बात नहीं बनी। दूसरी कहानियों पर जो फ़िल्म है वह निरूपा राय, बलराज साहनी की  सन् १९५९ की हीरा-मोती है जो दो बैलो की कथा पर आधारित है, १९६३ की राजकुमार और कामिनी कौशल की गोदान जो मुख्य रूप से उपन्यास गोदान पर आधारित हैं, १९६६ की सुनील दत्त की ग़बन, १९७७ की अमजद खान, सईद जाफरी, संजीव कुमार शबाना आजमी से सजी शतरंज के खिलाड़ी, १९८१ की सदगति, या दूरदर्शन में गोदान, निर्मला, ईदगाह, बूढ़ी काकी, नमक का दरोगा, सवा सेर गेहूँ के नाट्य रूपांतरण।
                        रचना जितनी रच बस जाती है, पढ़ने का उतना ही जी करता है, सभी किस्म के चित्रण का दर्पण कोई बचपन का अनूठा किस्सा, कहीं इतना स्वच्छंद पात्र जो खाक में मिलने के बाद भी ना मिले या ऐसे बंधे पात्र जिसका जन्म जन्मांतर से मौत से कोई लेना-देना नहीं हो, ये कालजयी रचना युवा पीढ़ी की "मिस पद्मा", हो या किशोरवय की "जादू", या धार्मिक उन्माद के चलन "हिंसा परमो धर्म:",  आज के बढ़ते चलन और कदम की तरह बासी भात में खुदा का साझा", जिससे आज सभी एकमत रहते है कि यह तो राजस्व का जरिया है और किसी लती की आदत की, उस मदिरा पर ना जाने कितने ही क्रांति करने वाले ब्रह्मा, ८ अक्टूबर, १९३६, को खुद के जिंदगी में सेहत से हार गए।






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4 टिप्‍पणियां:

Ashu Mishra ने कहा…

विद्यार्थी जीवन से ही मुंशी प्रेमचंद मेरे प्रिय लेखक रहे है

Unknown ने कहा…

Superb

Gudiya Sharma ने कहा…

Onevof My favourite ⭐

Chanchala Sharma ने कहा…

😇👏👏👏👏