भूमिका
मित्रो पिछले अंक में अपने पढ़ा था लघुकथा अंक एक जिसमे कई भिन्न भिन्न परिवेश को इंगित करती लघु कथाएं थी, आशा करती हूं आपने वह पूरा पढ़ा हो🙏,
इस अंक में पढ़िए लघुकथा अंक दो, कृपया इसे भी पूरा अवश्य पढ़े और ऑडियो सुनने के लिए दिए गए लिंक में भी जाएं, पिछले अंक को आप सब का बहुत सहयोग मिला, जिसके लिए मैं आप सब का धन्यवाद करना चाहती हूं।
—सीमा शर्मा
लघुकथा अंक दो
१). निरीह आंखे
"मेरे नाम की संपत्ति को मैं राख कर दूं तो क्या !"
(उसने ऐंठ कर कहा)
पर्दे के आड़ लिए दो निरीह आंखे कभी कुपित मां को देखते थे, कभी पिता को ।
(लघुकथा)
२.). प्रेम
"माफ़ कर दीजिए आगे से नहीं करेगा",
"इतनी दीनता ही दिखा कर अपने बेटे को नियंत्रित कर लेते तुम, ...मैं नशे में नहीं हूं, सो माफ करूं, हूं, तुम किस नशे में रहते रहे?"
"प्रेम"
(निराशा भरे स्वर में वह वही बैठ गया)
(लघुकथा)
३.). पुराना रूप
"हमारा भी हिस्सा है बराबर का"
तन कर खड़ा बेटा, बहन की तरफ देख भी
नहीं रहा था। पसोपेश में फंसे पिता बेटे के जगह अपने
25 साल पुराने रूप को देख रहे थे।
(लघुकथा)
४.).दो गली ज्यादा
"आपकी दुकान उधर होगी ये सोचकर मैं दूसरे रास्ते से मुड़ गई.... भईया के साथ ही सही पते पर आई हूं", मालती ने कहा
"ओह, वैसे मेरी दुकान से घर पहुंच सेवा भी है।" :दुकानदार
मुहाने खड़ी वह एक टक निहारने वाली आंखे फिर घूर रही थी।
(ऐसे रास्ते की गवाही धूल धूसरित, कहीं पड़ी नहीं है, उन लाखों मुड़ते हुए कदमों के हवाले है, जो किसी न किसी, नजर के कारण, दो गली ज्यादा चल नहीं सकती।)
(लघुकथा)
पाठको आज के लिए इतना ही, मिलेंगे नए अंक में नए लघुकथाओ के साथ एक नए पोस्ट में, मित्रों मेरे विषय में आप मेरे वेबसाइट के विषय के कॉलम में जा कर पढ़ सकते है, मैं एक प्राध्यापिका हूं विधि महाविद्यालय में पिछले १९ वर्षो से अध्यापन कार्य से जुड़ी हूं, मैं मूलतः राजनांदगांव में जन्मी थी मेरी शिक्षा भूमि बिलासपुर है कर्मभूमि दुर्ग, छत्तीसगढ़, और मेरा ससुराल रायपुर में मैं अपने पति और बच्चों के साथ रायपुर छत्तीसगढ़ में रहती हूं।
©Seema Sharma
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