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रविवार, 30 जुलाई 2023

शायरी, दर्द का बंटवारा, युवा और खैर खवाह

दोस्तो आज पेश है मेरी कलम से लिखी एक शायरी, जिसे मैंने सबसे पहले Your Quote App पर सन् २०२० में लिखा था, जिसे आज मैं अपने ब्लॉगिंग साइट पर शेयर कर रही हूं।

—सीमा शर्मा 

शायरी

दर्द का बंटवारा
तक़दीर से लिखे फलसफे के खत पढ़ी जाती हूँ, 
आजकल रोने को मैं गुनगुनाकर सुनाती हूँ, 
तेरी दौलत कहती है,
 तेरे दर से,
किसी कलपते का, 


आना जाना लाजिमी है,
कल ही देख, 
टूटते कदम और टपकती आंसू, 
खुदाई की सोचती हूँ, आसमानी तख्त पर अटूट,
किसी को यकीं  जरूर होगा, 
तेरी बेइंसाफी देख लगता हैं, 
तूने उसके ख्वाब किसी दिन रौंदा जरूर होगा, 
तू भी रुक के देखना, 
तेरे किसी शीशमहल के तले उसका घरौंदा जरूर होगा, 
और,


तेरे सताये से क्या फरमाऊं,
 'सुन ऐ गैरत-दार, 

जो खुदाई करने से तू न हारे, 
तो आगे भी तू न किया बिगाड़,

बस रह सब्र थाम, 
कभी उसी छीनने वाले से ही सुना है, 
रहम फरमाना ही है,
उस सबक़त का काम।

—सीमा शर्मा 


युवा

नई शक्लें बनाते हैं,
मानचित्र में ये नौका चलाते है,
दूर दूर जो हिलोरे खाते है,
वो सागर भी स्वप्न भीगा जाते है, 
कल्पना की दुनिया हैं,
 वो बबलू हैं, वो मुनिया हैं,
खेल खेल में मेरे शहर घुम आते हैं,
 ओ नगर थोड़े और हुए हो विस्तृत
 तो रास्ता छोटा रखना 
मेरी उम्र ज्यादा हो गई हैं।

—सीमा शर्मा



ख़ैर ख्वाह

तेरे लिए दुआ माँगी,
कबूल काबिलियत हुई,
 तेरे लिए आसमान मांगा,
 कबूल, 
उड़ान हुई,
 मांग रही थी, 
ऊंचाई, 
कबूल हिफाजत हुई!

—सीमा शर्मा 



©Seema Sharma
Copyright 2020-2023




लघुकथा अंक द्वितीय, निरीह आंखे, प्रेम, पुराना रूप और दो गली ज्यादा

भूमिका

मित्रो पिछले अंक में अपने पढ़ा था लघुकथा अंक एक जिसमे कई भिन्न भिन्न परिवेश को इंगित करती लघु कथाएं थी, आशा करती हूं आपने वह पूरा पढ़ा हो🙏, 
इस अंक में पढ़िए लघुकथा अंक दो, कृपया इसे भी पूरा अवश्य पढ़े और ऑडियो सुनने के लिए दिए गए लिंक में भी जाएं, पिछले अंक को आप सब का बहुत सहयोग मिला, जिसके लिए मैं आप सब का धन्यवाद करना चाहती हूं।

—सीमा शर्मा 

लघुकथा अंक दो

१). निरीह आंखे


" अपने मन की मनमानी करते हुए, तुमने पहले ही काफी नुकसान कर दिया है !"
 "मेरे नाम की संपत्ति को मैं राख कर दूं तो क्या !"
 (उसने ऐंठ कर कहा) 


पर्दे के आड़ लिए दो निरीह आंखे कभी कुपित मां को देखते थे, कभी पिता को ।

(लघुकथा)



२.). प्रेम  
"माफ़ कर दीजिए आगे से नहीं करेगा",
"इतनी दीनता ही दिखा कर अपने बेटे को नियंत्रित कर लेते तुम, ...मैं नशे में नहीं हूं, सो माफ करूं, हूं, तुम किस नशे में रहते रहे?"

"प्रेम"

 (निराशा भरे स्वर में वह वही बैठ गया)

(लघुकथा)


३.). पुराना रूप

"हमारा भी हिस्सा है बराबर का"

 तन कर खड़ा बेटा, बहन की तरफ देख भी 
नहीं रहा था। पसोपेश में फंसे पिता बेटे के जगह अपने 
25 साल पुराने रूप को देख रहे थे।

(लघुकथा)


४.).दो गली ज्यादा

"आपकी दुकान उधर होगी ये सोचकर मैं दूसरे रास्ते से मुड़ गई.... भईया के साथ ही सही पते पर आई हूं", मालती ने कहा


 "ओह, वैसे मेरी दुकान से घर पहुंच सेवा भी है।" :दुकानदार 

मुहाने खड़ी वह एक टक निहारने वाली आंखे फिर घूर रही थी।


 (ऐसे रास्ते की गवाही धूल धूसरित, कहीं पड़ी नहीं है, उन लाखों मुड़ते हुए कदमों के हवाले है, जो किसी न किसी, नजर के कारण, दो गली ज्यादा चल नहीं सकती।)

(लघुकथा)





पाठको आज के लिए इतना ही, मिलेंगे नए अंक में नए लघुकथाओ के साथ एक नए पोस्ट में, मित्रों मेरे विषय में आप मेरे वेबसाइट के विषय के कॉलम में जा कर पढ़ सकते है, मैं एक प्राध्यापिका हूं विधि महाविद्यालय में पिछले १९ वर्षो से अध्यापन कार्य से जुड़ी हूं, मैं मूलतः राजनांदगांव में जन्मी थी मेरी शिक्षा भूमि बिलासपुर है कर्मभूमि दुर्ग, छत्तीसगढ़, और मेरा ससुराल रायपुर में मैं अपने पति और बच्चों के साथ रायपुर छत्तीसगढ़ में रहती हूं।

©Seema Sharma
Copyright 2023
©सर्वाधिकार सुरक्षित 

बुधवार, 26 जुलाई 2023

लघुकथा अंक प्रथम, कमी और बुदबुदाहट

लघुकथा अंक




कमी


"अब....अब
ये किसकी कमी है",

"आप तो जानते ही है!",

ऐसा निम्न स्तर का काम?", 
"मैं जानता हूं? अं हां हां, दूगुने पगार पर भी.. किसी और को ढूंढ लाओ" 
"जी"

‘मास्टर्स इन जी हुजूरी’ 

(वह मन में बुदबुदाया)

(लघुकथा)

इस कहानी का ऑडियो सुनने के लिए इस लिंक में जाएं
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बुदबुदाहट


"क्यूं बार बार खिलना
जब हैं मिट्टी में मिलना "

"ये कैसी, अजीब तुकबन्दी कर रहे,
 कितनी मुर्दनगी हैं इसमें!" 
उसने आगे कहा: "क्यूँ इतना सता रहे हो, 
बीती जो मुझपे उसे तुम क्या - क्या बता रहे हो",



उसने फिर टोका "कुछ खैर ढ़ाओ ! और आंसू मत बरसाना!"

 मगर उसने कहना जारी रखा, "ठीकरा सितारे से टूट गिर रहा,
 उम्र कोई और जिये, "मर में रहा", वह उसे और टोकता पर तब
 तक बेकार बुदबुदाहट धीरे-धीरे बन्द हो चुकी थी।

 (लघुकथा)

Seema Sharma
©सर्वाधिकार सुरक्षित 

Copyright: 2020-2023

शनिवार, 22 जुलाई 2023

अमरनाथ यात्रा

अमरनाथ यात्रा 







"ऋषि भृगु पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अमरनाथ की खोज की थी।
ऐसा माना जाता है कि कश्मीर की घाटी पानी के भीतर डूबी हुई थी, और ऋषि कश्यप ने इसे नदियों और नहरों की एक श्रृंखला के माध्यम से सूखा दिया था। परिणामस्वरूप, जब पानी सूख गया, तो भृगु अमरनाथ में शिव के दर्शन करने वाले पहले व्यक्ति थे।
कालांतर में यह सनातन विश्वासियों के लिए भगवान शिव का निवास और वार्षिक तीर्थस्थल बना।"


मित्रों इस पोस्ट में पढ़े अमरनाथ यात्रा से संबंधित जानकारी

वर्ष की प्रतीक्षित यात्राओं में से एक, अमरनाथ यात्रा हिंदू कैलेंडर के श्रावण माह के अनुसार जुलाई से अगस्त के महीनों में आयोजित की जाती है।अमरनाथ की यात्रा 30 जून से शुरू हो चुकी है और 11 अगस्त तक चलेगी. हर साल लाखों लोग बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए अमरनाथ यात्रा पर जाते हैं. कहा जाता है कि अमरनाथ धाम के गुफा में भगवान शिव ने माता पार्वती को अमर होने का रहस्य बताया था. इस रहस्य को बताने के लिए वो एकान्तवास की खोज कर रहे थे. तब उन्होंने अपने सभी प्रिय जनों को त्याग 
दिया। 

ऋषि भृगु पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अमरनाथ की खोज की थी।
ऐसा माना जाता है कि कश्मीर की घाटी पानी के भीतर डूबी हुई थी, और ऋषि कश्यप ने इसे नदियों और नहरों की एक श्रृंखला के माध्यम से सूखा दिया था। परिणामस्वरूप, जब पानी सूख गया, तो भृगु अमरनाथ में शिव के दर्शन करने वाले पहले व्यक्ति थे।
कालांतर में यह सनातन विश्वासियों के लिए भगवान शिव का निवास और वार्षिक तीर्थस्थल बना।


ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव ने अपने वाहन नंदी बैल को पहलगाम (बैल गांव में छोड़ दिया था। चंदनवारी में, उन्होंने चंद्रमा को अपने बालों (जटा) से मुक्त किया। जहां उन्होंने अपने अनंत नामक नाग को त्यागा, वह स्थान अनंतनाग और जहां शेष नामक नाग को छोड़ा, वह शेषनाग नाम से विख्यात है

"पोस्ट का ऑडियो सुनने के लिए इस लिंक में जाएं।"

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महागुणस पर्वत


शेषनाग झील के बाद महागुणस पर्वत का पड़ाव आता है. यहां शिव जी ने अपने पुत्र गणेश को स्थान दिया था. इस स्थान को गणेश टॉप के नाम से भी जाना जाता है. कहा जाता है कि ये स्थान अत्यंत सुंदर और मन को मोहित करने वाला है. इस स्थान को महागणेश पर्वत भी कहा जाता है.पंचतरणी में, शिव ने पांच तत्वों पृथ्वी, जल, वायु, - अग्नि और आकाश को त्याग दिया। सांसारिक संसार के त्याग के प्रतीक के रूप में, भगवान शिव ने तांडव नृत्य किया, अंततः, भगवान शिव ने माता पार्वती के साथ अमरनाथ गुफा में प्रवेश किया, वहां भगवान ने माता पार्वती को अमर कथा सुनाई पर वह पूरी अमर कथा नहीं सुन पाई क्योंकि उन्हें नींद आ गई थी, किंवदंतियों के अनुसार वह कथा 2 कबूतरों ने सुनी थी जो वहां उपस्थित थे (किंवदंतियों का कहना है कि वे दोनों कबूतर अभी भी वहां है)


श्रद्धालू शांति, ज्ञान, समृद्धि और सबसे महत्वपूर्ण रूप से सर्वोच्च भगवान शिव का आशीर्वाद पाने के लिए आध्यात्मिक अमरनाथ यात्रा मार्ग पर एक जुलाई से निकले है
बाबा बर्फानी की गुफा तक पहुंचने के दो रास्ते हैं। पहला पहलगाम, यह पारंपरिक मार्ग है, जिस पर चढ़ना आसान है। करीब 47 किलोमीटर के इस रास्ते को तय करने में 2 से 3 दिन का समय लगता है।

दूसरा रास्ता बालटाल से होकर जाता है। यह एक नया ट्रैकिंग रूट है, जो 14 किमी का है, जो पहलगाम के आधे से भी कम है। इस पर एक दिन में चढ़ाई की जा सकती है।गुरुवार को 4,600 से ज्यादा यात्री अमरनाथ के लिए रवाना हुए थे


देशभर से रोजाना हजारों श्रद्धालु बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। मौसम भी भोले के भक्तों के लिए अनुकूल रहा। यह यात्रा पारंपरिक बालटाल और पहलगाम से जारी है। गुरुवार को बम-बम भोले और जय शिव शंकर के जयकारों के बीच 8574 श्रद्धालुओं ने बाबा बर्फानी के दरबार में हाजिरी लगाई। इसके साथ ही कल श्रद्धालुओं की संख्या तीन लाख को पार कर गई.


शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

गांधी जयंती (क्रमशः)

बापू 

द्वितीय

बापू के प्रिय भजन**
हरि, तुम हरो जन की भीर।
द्रौपदी की लाज राखी, तुम बढ़ायो चीर।
भक्त कारन रूप नरहरि, धरयो आप सरीर।
हरिनकश्यप मार लीन्हो, धरयो नाहिन धीर,
बूड़ते गजराज राख्यो, कियो बाहर नीर।
दासि मीरां लाल गिरधर, दुख जहां तहां पीर।

गांधी जी के एकादश व्रत**

जिसमे सत्य को परमेश्वर कहा, सत्य आग्रह सत्य विचार, सत्य वाणी और सत्य कर्म, अहिंसा: बिना अहिंसा के सत्य की खोज असंभव हैं, ब्रह्मचर्य: न केवल जनेन्द्रिय बल्कि सर्वेन्द्रीय पर नियंत्रण, अस्वाद: भोजन शरीर पोषण के लिए होना चाहिए, अस्तेय: (चोरी न करना) दूसरे की वस्तु लेने के अलावा आवश्यकता से अधिक संग्रह करना चोरी है, अपरिग्रह: धन संबंधी न होकर विचार और इच्छापूर्वक परिग्रह कम करना, इसके कम होने से सुख और सच्चा संतोष बढ़ता है, सेव शक्ति बढ़ती है, अभय: जो सत्यपरायण रहे वह न तो जात बिरादरी से डरे न सरकार से चोर बीमारी मौत से न डरे, न किसी के बुरा मानने से डरे, अस्पृश्यता निवारण: प्रत्येक हिन्दू का धर्म कर्तव्य हैं कि छुआछूत का निवारण करे, शरीर श्रम: बिना कारण दुसरो से सेवा न लेते हुए जिनका शरीर खुद काम ले सकता हैं, सारे काम खुद करना चाहिए, सर्वधर्म समभाव: सभी धर्मों का बराबर सम्मान करना चाहिए तथा प्रार्थना करनी चाहिए कि सभी धर्मों के दोष दूर हो जाए, स्वदेशी: अपने आसपास रहने वालों की सेवा में लीन होना स्वदेशी धर्म हैं, जो निकट के लोगो के सेवा छोड़ कर दूर के लोगो की सेवा करने दौड़ता है वह स्वदेश भंग करता हैं।

रचनात्मक कार्यक्रम

रचनात्मक कार्यक्रम को सत्य और अहिंसात्मक साधनों द्वारा पूर्ण करना स्वराज्य की रचना कहा जा सकता है। ....उसके एक एक अंग पर विचार करें।

कौमी एकता- एकता का मतलब सिर्फ राजनैतिक एकता नहीं है।.... सच्चे मानी तो हैं वह दिली दोस्ती, जो तोड़े न टूटे। इस तरह की एकता पैदा करने के लिए सबसे पहली जरूरत इस बात की है कि कांग्रेसजन, वे किसी भी धर्म के मानने वाले हों, अपने को हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी- सभी कौमो का नुमाइंदा समझें।

अस्पृश्यता निवारण- हरिजनों के मामले में तो हरेक हिन्दू को यह समझना चाहिए कि हरिजनों का काम उसका अपना काम है।

मद्य निषेध- अफीम, शराब, गांजा वगैरा चीजो के व्यसन में फंसे हुए अपने करोड़ो भाई बहनों के भविष्य को सरकार की मेहरबानी या मर्जी पर झूलता नहीं छोड़ सकते। इन व्यसनों के पंजे में फंसे हुए लोगो को छुड़ाने के उपाय निकालने होंगे।

खादी- खादी का मतलब है देश के सभी लोगो की आर्थिक स्वतंत्रता और महानता का आरंभ। खादी में जो चीजें समाई हुई हैं, उन सब के साथ खादी को अपनाना चाहिए। खादी के एक मतलब यह है कि हममें से हरेक को सम्पूर्ण स्वदेशी की भावना बढ़ानी और टिकानी चाहिए।

दूसरे ग्रामोद्योग- हाथ से पीसना, हाथ से कूटना और पछोरना, साबुन बनाना, कागज बनाना, दियासलाई बनाना, चमड़ा बनाना, तेल पेरना और इस तरह के दूसरे सामाजिक जीवन के लिए जरूरी और महत्व के धंधों के बिना गांवों की आर्थिक रचना सम्पूर्ण नहीं हो सकती।

गांवों की सफाई: देश मे जगह जगह सुहावने और मनभावने छोटे-छोटे गांवों के बदले हमें घूरे जैसे गांव देखने को मिलते हैं।.....हमारा फर्ज हो जाता है कि गांवों को सब तरह से सफाई के नमूने बनावें।

बुनियादी तालीम- बुनियादी तालीम हिंदुस्तान के तमाम बच्चों को, वे गांवों में रहने वाले हो या शहरों के, हिंदुस्तान के सभी श्रेष्ठ तत्वों के साथ जोड़ देती है। यह तालीम बालक के मन और शरीर दोनो का विकास करती हैं।

प्रौढ़ शिक्षा- बड़ी उम्र के अपने देशवासियों को जबानी, यानी सीधी बातचीत द्वारा सच्ची राजनैतिक शिक्षा दी जाय।

आरोग्य के नियमो की शिक्षा- हमारे देश की दूसरे देशों से बढ़ी-चढ़ी मृत्यु संख्या का ज्यादातर कारण निश्चय ही गरीबी है, जो देशवासियों के शरीर को कुरेदकर खा रही है; लेकिन अगर उनको तन्दरूस्ती के नियमो की ठीक-ठीक तालीम दी जाय, तो उसमें बहुत कमी की जा सकती है। जब बीमार पड़े तब  अच्छे होने के लिए अपने साधनों की मर्यादा के अनुसार प्राकृतिक चिकित्सा करें।

प्रांतीय भाषाएं- हिंदुस्तान की महान भाषाओं की अवगणना की वजह से हिंदुस्तान को बेहद नुकसान हुआ है, उसका कोई अंदाजा हम नहीं कर सकते।.....जब तक जनसाधारण को अपनी बोली में लड़ाई के हर पहलू और कदम को अच्छी तरह से नहीं समझाया जाता, तब तक उनसे यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे उसमे हाथ बटायेंगे।

राष्ट्रभाषा- समूचे हिंदुस्तान के साथ व्यवहार करने के लिए हमको भारतीय भाषाओं में से एक ऐसी भाषा की जरूरत है, जिसे आज ज्यादा-से-ज्यादा तदाद में लोग जानते औऱ समझते हों, बाकी के लोग जिसे झट सीख सकें और वह भाषा हिन्दी (हिंदुस्तानी) ही हो सकती है।

आर्थिक समानता- आर्थिक समानता के लिए काम करने का मतलब है पूंजी और मजदूरों के बीच के झगड़ों को हमेशा के लिए मिटा देना।....अगर धनवान लोग अपने धन को और उसके कारण मिलने वाली सत्ता को खुद राजी-खुशी से छोड़कर और सबक कल्याण के लिए सबों के साथ मिलकर बरतने को तैयार न होंगे, तो यह सच समझिए कि हमारे मुल्क में  हिंसक और खूंखार क्रांति हुए बिना नहीं रहेगी।

किसान- स्वराज्य की इमारत एक जबरदस्त चीज़ है, जिसे बनाने में अस्सी हजार करोड़ हाथों के काम है। इन बनाने वालों में किसानों की तादाद सबसे बड़ी हैं। सच तो यह है कि की स्वराज्य की इमारत बनाने वालों में ज्यादातर(करीब ८० फीसदी)  वे ही लोग हैं, इसलिए किसान ही कांग्रेस है, ऐसी हालत पैदा होनी चाहिए।

मजदूर- अहमदाबाद के मजदूर-संघ का नाम समूचे हिंदुस्तान के लिए अनुकरणीय है क्योंकि वह अशुद्ध हिंसा की बुनियाद पर खड़ा है।... मेरा बस चले तो हिंदुस्तान की सब मजदूर संस्थाओं का संचालन अहमदाबाद के मजदूर-संघ की नीति पर करूं।

आदिवासी- आदिवासियों की सेवा भी रचनात्मक कार्यक्रम का एक अंग है ।....समूचे हिंदुस्तान में आदिवासियों की आबादी दो करोड़ है।.... उनके लिए कई सेवक काम कर रहे हैं फिर भी उनकी संख्या काफी नहीं है।

कुष्ठ रोगी- यह एक बदनाम शब्द है। फिर हममें जो सबसे श्रेष्ठ या बढ़े- चढ़े है, उन्ही की तरह कुष्ठ रोगी भी हमारे समाज के अंग हैं। पर हकीकत यह है कि जिन कुष्ठ- रोगियों को सार-संभाल कि सनसे ज्यादा जरूरत है,  उन्हीं को हमारे यहां जान-बूझकर उपेक्षा की जाती है।

विद्यार्थी- विद्यार्थी भविष्य की आशा है।....इन्हीं नौजवान स्त्रियों और पुरुषों में तो राष्ट्र के भावी नेता तैयार होने वाले हैं विद्यार्थियों को दल बंदी वाली राजनीति में कभी शामिल नहीं होना चाहिए उन्हें   राजनैतिक हड़तालें नहीं करनी चाहिए। पहनने-ओढ़ने के लिए वे हमेशा खादी का इस्तेमाल करें।

स्त्रियां- स्त्री को अपना मित्र या साथी मानने के बदले  पुरुष ने अपने को उसका स्वामी माना है। कांग्रेस वालों का यह खास कर्तव्य है  कि हिंदुस्तान की स्त्रियों का इस गिरी हुई हालत से हाथ पकड़ कर ऊपर उठावें।

गो-सेवा-  गोरक्षा मुझे बहुत प्रिय है। मुझसे कोई  पूछे कि हिंदू धर्म का बड़े-से-बड़ा ब्रह्म स्वरूप क्या है तो मैं गौ रक्षा बताऊंगा। मुझे वर्षों से  दिख रहा है कि हम इस धर्म को भूल गए हैं। दुनिया में ऐसा कोई देश मैंने नहीं देखा, जहां गाय के वंश की, हिंदुस्तान जैसी लावारिस हालत हो।

‘इस अपढ़, अनगढ़ लेकिन निश्चयी किसान ने मुझे जीत लिया.’

अपने सत्य के प्रयोग में गांधी जी ने इस पर लिखा है।***

जबरन नील की खेती कराए जाने से किसानों चंपारण, बिहार के  पश्चिमोत्तर में स्थित, किसान खाद्यान्न के स्थान पर नील के खेती को मजबूर थे, लखनऊ अधिवेशन में मिले एक किसान राजकुमार शुक्ल ने महात्मा गांधी से आग्रह किया कि वह स्वयं वहां आकर का हाल देखे, पहले इस पर प्रताप के संपादक श्री गणेशशंकर विद्यार्थी नील की खेती पर कई ज्वलंत लेख लिख चुके थे, कांग्रेस ने लखनऊ अधिवेशन में प्रस्ताव पारित किया उससे भी राजकुमार शुक्ल सन्तुष्ट नहीं हुए और गांधी जी को वहाँ स्वयं चल के जाने का आग्रह किया।

१० अप्रैल १९१७ को वहाँ पहुंचे, फिर जो हुआ वो इतिहास है, अफ्रीका में अपनाए सत्य और अहिंसा के हथियार गांधीजी ने पहली बार भारत मे प्रयोग किया, पीड़ित किसानों के बयान कलमबद्ध किये गए , ध्यान रहे इसमें कांग्रेस की सहायता नहीं ली गयी थी, जनता का जबरदस्त सहयोग था। चार माह के बाद यह रंग ले आया, और धीरे धीरे १३५ साल पुरानी नील की खेती बन्द हो गयी। 

वें जमींदार निलहे साहब के नाम से प्रसिद्ध थे। जब गांधी जी १९१७ मे वहां जांच करने गए तो उन्हें सरकारी सूचना मिली कि वह चंपारण से निकल जाए, गांधी जी ने इनकार कर दिया, अंग्रेजी सरकार ने उनपर मुकदमा चलाया, गांधी जी ने निधड़क सच कह कर स्वीकार किया कि सरकारी आदेश की जानबूझकर उन्होंने तामीली नहीं की, सरकार पर  उनके सत्याग्रह का असर हुआ और उनकी शिकायतें सुनी गई।****






                                                                                      

**गांधी डायरी, सस्ता साहित्य मण्डल

***विकिपीडिया

****भारत के गौरव (पांचवा भाग)

                                                                                       

क्रमशः......

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