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बुधवार, 21 मई 2025

मैचोंग तूफ़ान

मैचोंग तूफ़ान

ठंडी हवा से मुंह धोते धोते थोड़ा खोने लगी थी की ख़्याल आया, शायद यह जमीन से टकरा कर आई हो, जाड़े सी ठिठुरन थी मिचौंग तूफ़ान की फिर भी धूसरित हवा जो मानो चेहरे से चिपक ही गई थी, मैंने पानी से चेहरा साफ करना तय किया। जो हवा से भी ठंडा था, कुछ वक्त बीतते ही हवा फिर उफ़ान से चहलकदमी करने लगी, चेहरे पर बढ़ती चढ़ाई थी और बार बार मुंह साफ़ करने की ज़िद।
 मेरे दिल से यह बात मिटनी मुश्किल हो गई की यह किसी पर ठहर कर नहीं आई हो, की यह किसी से टकरा कर नहीं आई हो, की मेरे नथुनों में प्रवेश के पहले अपने पैर झाड़ पोंछ कर आई हो या नहीं।इस हालात का हल निकालने मैंने खिड़की से झांकना तय किया, जिसे पता नहीं कैसे उसने मेरा खुला न्यौता समझ लिया और पूरे जोरों शोरों से दल बदल कक्ष के अंदर घुसने लगी। "अरे, अरे यहां कहां घुसी चली आती हो, रुको रुको..",
एकाएक आंख मूंदकर मैंने चिल्लाना शुरू कर दिया, पर शायद उसकी सुनने की ताक़त ख़त्म हो चुकी थी, बस नज़र थी जिसका निशाना मेरे कान और आंखे बींधना था, मैंने अंदाजे से उसके कान के तरफ़ हाथ बढ़ाया, उनको पकड़ कर अपने तरफ़ खींच कर पीछे धकेल दिया, वह सकते में आ गई। तभी मेरे कंधे पर थोड़ा धक्का लगा। मेरे मानने में नहीं आ रहा था, यह इतनी बली कैसे हो गई की इसने मेरे कंधो को झकझोर दिया, हालात का जायज़ा लेने मैने ज्यों ही आंखो को खोला पास ही मां को बैठा पाया।
 शायद सब कुछ सपने में चल रहा था। मां हैरान भंगिमा से मुझे देख रही थी। शायद वह मेरी बड़बड़ाहट सुन कर घबरा गई थी, और मुझे उठाने आई थी। खिड़की अब भी खुली थी मगर तूफान जा चुका था। उसके नन्हें रूप भी नगण्य थे। जहां कान के आकार की दो पत्तियां पड़ी थी।

—प्राची शर्मा

मंगलवार, 20 मई 2025

मुबादला

मुबादला


बुधवार का दिन, एक बहुत बड़ा बाज़ार,

और

एक वार्षिक उत्सव के चलते, चहल पहल वाली दोपहर,
ऊपर नीले आकाश में एक स्वर्ण से रंग रूप वाले देव बड़े गौर से

आते जाते लोगों को देख रहे थे,

अनेकानेक जन आते जाते एक दूसरे के या अपने काम से मतलब रखने वाले,सैकड़ों, हजारों लोग, आकाश से यह एक समुद्र जैसे दिख रहा था, जिसके असंख्य शीश है, इनके तलों में खारा पानी ना होकर माथे से टपकता था, देव थोड़े परेशान हुए,


बेचैन हुए, उन्हें लगा, पिछले सप्ताह उनके भीतर उठने वाले ज्वालामुखी के फलस्वरूप यह भीषण गर्मी उपजी है, जिसके कारण,
उनके नेत्रों में इतनी ऊष्मा आ गई है, और नतीजतन, मानव नेत्रों में समुद्र सदृश्य वातावरण निर्मित हो गया है। और इस तापमान को कम होने में अभी सर्दी के आने के जितना वक़्त था, वह इन लोगों को थोड़ी राहत देने का सोचने लगे, भाव विह्वल होते देव को तब एक फेरी वाला हरकारे की तरह आवाज़ लगाता धरती पर जाता दिखा। वह कहता जा रहा था।

पश्चिम की ओर से आती, यह तल्खी भरी आवाज़ ने उमस में और अधिक कांटे बोने शुरू किए, ऐसे समय में बहुत सारे लोग इर्द गिर्द इकट्ठे होने लगे, उस ओर जाने लगे जहां से वह विश्राम को जायेंगे। तब वह व्यक्ति और ज़ोर ज़ोर से आवाजें देने लगा।

"बेचैनी है,

बेचैनी है,

बहुत सारी बेचैनी है,

जल्दी बोलिए,

दाम सिर्फ एक पल !,

कीमत गौर से सुनिए, सिर्फ एक पल,

सिर्फ़ एक पल,

खिदमत हमारी, पसन्द आपकी !",

वह विभिन्न दर्शनों की किताबें बेच रहा था,

फुसफुसाहट शुरू हो गई,

ऐसे रुपए तो किसी के पास नहीं थे, जिसे चुका कर वह बेचैनी ख़रीद लेते, अच्छे तमाशे की चाह में भीड़ बढ़ने लगी,

ऊपर आकाश में देव ये बढ़ती सुगबुगाहट देख खुद को रोक नहीं पाए, और ऐड लगा दी। हिनहिनाते घोड़े मानो पहिए बन गए,
इधर फर्राटे की आवाज़ से एक शानदार और चकमक गाड़ी रुकी, उस से एक संभ्रांत व्यक्ति बाहर आए। उस हरकारे की महफ़िल जहां पश्चिम का गढ़ था, वह वहां मुस्कुराते हुए चले गए।

"मुझे खरीदना नहीं है, क्या यहां, मुबादला होगा?" देव ने कहा। ढेर सारी नज़र उनसे टकरा रही थी, पर अंधेरा हो जाने के कारण कोई उन्हें देख नहीं पाया।

-प्राची शर्मा 
©2024
सर्वाधिकार सुरक्षित 

शुक्रवार, 29 सितंबर 2023

लघुकथा भाग पांच, नरमी, सलाह, और अन्य लघुकथाएं। मशविरा, रोज़ाना की एक बात,

लघुकथा (भाग पांच)
Hello Friends,
 आज पढ़े लघुकथा अंक पांच।



नरमी

"जब बात बिगड़ जाए..........", 

(बीच में टोक कर)

"उसे डांट कर सुधारना "

"अरे रे रे यह क्या कह रहे", 

"आ हां बच्चा बिगड़े तो..."


Father's discussing young generation actions

"मैंने बच्चा नहीं बात कहा था" 
"ओह माफ करना, मेरे बेटे ने मुझे बहूत परेशान कर दिया है, वैसे.. बात बिगड़े तो थोड़ा ज्यादा नर्मी से पेश आया करो" 
"तुम भी..", 
"हां शायद यही ठीक है। 

(लघुकथा)


सलाह मशविरा

"अगर शिकार के मुँह से उफ़्फ़ नहीं निकलेगा! तब भला लाचारगी का क्या भाव मिलता?" "फिर भी दोयम दर्जे के नौकरी से बाज आना चाहिए",
Two person discussing unemployment problem



"कौन जानता है दोयम कौन आ'ला कौन, फिर जितनी होशियारी दिलानी मुनासिब थी हमने दिलाई "

"तब तो ये भी बहुत है", उसने दीदे नीची

कर कहा ।

(लघुकथा)


रोज़ाना की एक बात

"चलो, अकेले ही टहलते हैं",
"भले मरुस्थल ही हो?" 
Man walking in desert


अवाक देखते हुए, उसने इशारा किया। राहगीर समझ सकता उससे पहले एक खंजर उड़ कर सीधे उसके मर्म स्थल लग गया, वह पल के पल में ढेर हो गया। तलाशी लिया गया मात्र कुछ गहने मिले, मगर पीतल के निकले, टोली के सरदार ने अफसोस से कहा, "बेकार मारा गया।"


श श श श 

"अपनी सुनाओ तुम कैसे हो",
"कुछ ठीक नहीं है",
"ओह हुआ क्या?",

" श श श .... धीरे..... मेरी सास सो रही है"

(लघुकथा)


फेसबुक

"शब्दों के धुरंधर को आज शब्द नहीं मिल रहे, बस इतना पूछा है मैंने कुछ कर के भी दिखा देते, मां के लिए जो इतनी कविताएं गढ़ते हो फेसबुक पर ।" 
बगले झांकते बड़े भाई की पत्नी ने कहा: "तुम्हारी भी तो मां है अपने साथ ले जाओ" छोटा सकपका गया।
Interview of an aged writer



अंततः अंतिम संवाद के बाद अंतिम संपत्ति को तीन तीन महीने के लिए भाग किया गया।

(लघुकथा)


लेखिका

"किसी की याद लिखवाती है हमसे

वर्ना आयु का प्रकोप ऐसा है की चार पग। चलूं तो, ऊंह ऊंह", मैं खांसने लगती हूं। पत्रकार : पिचासी की अंक और बस आपकी लेखनी सरपट दौड़ते जा रही हूं, क्या सचमुच में किसी अन्य का ही प्रभाव है?",
Mother's illness and sons


 "ऊंह वह बात ये है, ऊंह ऊंह, ऊंह " मैं अचेत हो कर गिर पड़ी, उपस्थित सभी घबरा गए, मेरे नाम का स्वर, सर्वत्र गुंजायमान था। मैं खांसते खांसते अदृश्य हाथ पकड़ कर आगे बढ़ गई।

(लघुकथा)


घी

"ये बात तो ग़लत है पर सीधी उंगली से घी न निकले तो, उंगली टेढ़ी करनी ही पड़ती है"

"हुंह"

कुछ दिन बाद

पुलिस थाने में परेशान वह एक दूसरे को ताक रहे थे किसी ने घी का डब्बा आग के ऊपर ही रख दिया था।

(लघुकथा)


पार्टनरशिप

"मैंने पूछा था? ना मैंने तुम्हें कभी नहीं पूछा, तुम जबरदस्ती गले पड़ रहे", 
"वाह! चोरी पर सीना जोरी, साथ दिया मैंने पूरा, अकेले तुम भी माल नहीं उठा सकते थे, समझे!" 
Two thief fighting before police


" अरे जाने दे जाने दे, बड़ा आया", दोनो चोरों का झगड़ा बढ़ते हुए हाथापाई की नौबत आ गई, लड़ते लड़ते वह खुद ही पुलिस के पास पहुंच गए।

(लघुकथा)

समाप्ति

पाठकों आशा है यह अंक आप सभी ने पूरा पढ़ा हो, अन्य अंक पढ़े, इसी ब्लॉग में।



©2020-2023
कॉपीराइट: सीमा शर्मा, प्राची शर्मा
सर्वाधिकार सुरक्षित।

शनिवार, 26 अगस्त 2023

करीबी, इल्म, दिल, नसीहत और कश

करीबी

तुम संग हर लम्हा,
मुझे हक सा लगता रहा,
कभी लहम की आशिकी रही नहीं, 
कोई ज़ख्म दे कर,
ख़ुद मैं ही झूठी आह भी कैसे भरती, 
चल, 


कुछ और ग़लत फ़हमियों का क़त्ल करें! साथ में रो लें और अपना रुमाल भी सूख जाए।

- लाली

इल्म 

दिल सुधर जा,
कि ये इम्तिहान की तस्दीक है,
न चाह उसे और, 
कि वह नजदीक है,


जो इल्म भी हो जाये उसे, 
किसी ख्वाहिश की, 
आने देना न, 
ये आलम, हँसी कर दे तो गम नहीं, 
हां में मेरी ही मुश्किल बढ़ जाएगी।

-सीमा

दिल

पत्थर से बने इंसान, 
लहम के बने दिल पर,
सर रखते है! 


पूछिए,
की खूं-रेज़ी क्यों ना होगी!

-प्राची शर्मा

नसीहत

आराम के लिए,

शम्स का क़त्ल,

बेहद ख़राब है,

झूमना है, 

बिना काहिल हुए,

फिर भी नशा करना,

बेहद ख़राब है,

जबान की मालिश,

लज़्ज़त से ही करनी है, 

लेकिन खूं रेज़ी से ? 

बेहद ख़राब है,



सिर्फ़ तरक्की हासिल करनी है,

लेकिन सिर तक ऊपर जा रही है,

जो नज़र,

उन नसीहतों को ना मानना बेहद ख़राब है!!

-सीमा शर्मा

कश

हर एक सफ़ेद कागज़ पर,
ताज़ी आशिक़ी भरे,
इंतज़ाम उसके करगुजारियो पर किया करे, भागती सरपट शायरी,


कलम जिंदगी की मियाद लिखा करे, 
सुलगा रहे है होंठ,
बेफ़िक्री से, 
जैसे टक्कर से कोई हट जाए परे,
हज़म किया एक दिन उसे, 
उसी मुड़ी सफ़ेद कागज़ ने!

-सीमा शर्मा


कॉपीराइट 2023
©सर्वाधिकार सुरक्षित 
सीमा शर्मा, प्राची शर्मा 
सभी चित्र, Bing Chat AI द्वारा निर्मित

शुक्रवार, 11 अगस्त 2023

Ninad, My profession beginning

निनाद



"एक वृत्तांत याद आता है, दो छात्राएं मेरी कक्षा में अंतिम बेंच में मेहंदी लगा रही थी, पहले-पहल मैं हड़बड़ा गई, सोचा अपना ध्यान ही हटा लेती हूं लेकिन लगता थी कि उन दोनों का अपने प्रिय कार्य को विराम देने का मन था ही नहीं।
मैंने उनसे ऊंचे स्वर में उनसे कहा "कृपया पढ़ाई में ध्यान दीजिए" उनके एक मित्र ने तत्काल टिप्पणी करते हुए कहा "करने दीजिए मैडम, लगे रहो इंडिया, लगे रहो।"

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 ||श्री गणेशाय: नमः||

श्रृंखला भाग एक

 सन् २००४, अगस्त,

पहली कक्षा हो या पहला ब्लॉग, ज्ञान विस्तार को ही मैं लक्ष्य मानती हूं। मेरी पहली कक्षा, एल एल०बी० प्रथम वर्ष, भारतीय संविदा अधिनियम, १८७२, की थी, आरम्भ में विस्तृत पाठ्यक्रम, प्रश्न पूछे जाने का भय और नए वातावरण, मैंने स्वयं भी विधि स्नातक तथा विधि स्नातकोत्तर के समय अधिकाधिक स्वयं पाठ से पूर्ण किया है। अतः यह प्रथम अनुभव स्वयं को संयत करने का तथा आत्मविश्वास में वृद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक था, कुछ हृदयस्पर्शी वृत्तांत ऐसे भी रहे जहां मेरी कक्षा के विद्यार्थी यह कह के उत्साहवर्धन किया करते थे,
"मैडम, कोशिश करते रहिए आप सीख जाएंगी"।
<classroom>


"मुझे ज्ञात है मैं कभी भी अति कठोर या अति उदार नही थी, उद्दंड विद्यार्थियों को चेतावनी देने से, कुशाग्र विद्यार्थियों के उत्साह वर्धन तक सीमित रही।"
एक वृत्तांत याद आता है, दो छात्राएं मेरी कक्षा में अंतिम बेंच में मेहंदी लगा रही थी, पहले-पहल मैं हड़बड़ा गई, सोचा अपना ध्यान ही हटा लेती हूं लेकिन लगता थी कि उन दोनों का अपने प्रिय कार्य को विराम देने का मन था ही नहीं।
मैंने उनसे ऊंचे स्वर में उनसे कहा "कृपया पढ़ाई में ध्यान दीजिए" उनके एक मित्र ने तत्काल टिप्पणी करते हुए कहा "करने दीजिए मैडम, लगे रहो इंडिया, लगे रहो"।
इस बार मैंने तनिक क्रोध से फिर कहा, "वरना आप बाहर जा सकते हैं!", उनलोगों ने हड़बड़ा के अपना काम बंद किया, मुझे इस साहस पर हर्षमिश्रित गर्व अनुभव हुआ।
कई छात्र-छात्राएं, कक्षा मेंं ना ठहर के यदा-कदा बाहर ही दिखाई देते थे, कक्षा के दरवाजे के पास, लगातार बातचीत करते रहना या शोर करना, बहुत समय तक अनजान बने रहने के बाद, मैंने बोलने का मन बनाया, "देखिये आप सभी कक्षा मेंं बैठिये या इस जगह ऐसा व्यवहार मत करें!", मेरे कहे जाने का त्वरित असर हुआ, सारे के सारे उठ कर वहाँ से छू-मंतर हो गए। 
<students>


धीरे धीरे मैंने भी थोड़ा अधिक धैर्य रखना का प्रयास भी किया। समझना क्या होता है, अधिनियम, संहिता, कानूनों का निर्वचन, कौन किस प्रकार संबंधित है, कैसे एक एक धारा से आगे बढ़ते हुए पूरे अधिनियम, संहिता को समझा जा सकता है, दृष्टांत, व्याख्या , अन्य प्रकरण किस प्रकार से विधि को सर्वसम्मत बनाते हैं। शिक्षण कार्य, किसी अन्य कार्य से भिन्न है, चूंकि, इसमें शिक्षक के साथ विद्यार्थियों के मष्तिष्क का समता से विचार करते रहना आवश्यक है, मूलतः मैं हिंदी भाषी हूँ, आधुनिक समय अंग्रेज़ी भाषा के प्रभाव से लबरेज हैं, तथा सभी विद्यार्थी एक जैसे नहीं होते, कई को हिंदी के गूढ़ शब्द या वाक्य सर के ऊपर से चले जाते है, या हिंदी माध्यम के छात्रों को अंग्रेजी से यही आशा रहती हैं, ऐसे समय में "बेयर एक्ट" के द्विभाषी पुस्तक से बहुत सहायता रहती है, जैसे पहले हिंदी से पढ़ाना, पुनः उसे अंग्रेजी में पढ़ाना, मैं सर्वदा से यह मानती हूं कि पढ़ाने वाले व्यक्ति और पढ़ने वाले व्यक्ति में तारतम्यता बनी रहनी चाहिए। मैं सदैव प्रयासरत रहती हूं कि सीधे प्रश्नोत्तर करती रहूं , मेरे पढ़ाये हुए कितने ही विद्यार्थी आज विभिन्न न्यायालयों एवं उच्च न्यायालय में कार्यरत है, नए छात्रों के साथ जब कभी मैं उच्च न्यायालय के दौरे के लिए गई हूं, मुझे मेरे विद्यार्थियों से कई बार सामना हुआ है कई बार अलग अलग तरह के प्रकरण चाहे वह व्यवहार प्रक्रिया संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता एवं भारतीय दंड संहिता, इनका साक्ष्य अधिनियम के साथ समन्वय इसमें तर्क, साक्ष्य, में इनकी व्यवहारिकता कक्षा से पृथक ही रहती है यह भी जानने लायक है कि विधि की शिक्षा कक्षा से अधिक न्यायालय में है।
मेरे सर्वाधिक प्रयास इस हेतु रहते है कि मैं किन्ही भी छात्र - छात्राओं में कोई भेद ना करूँ। मेरी कक्षा में एक वयोवृद्ध सज्जन जो सेवानिवृत्त सिविल सर्जन थे से मेरी पहली भेंट थोड़ी हकलाहट से हुई, सारे संबल बटोर कर जब वह अपने जीवन गाथा स्वयं के अनुभव बताने लगे, थोड़े संयम से मैंने भी कहा "यहाँ आप भी छात्र है", धीरे-धीरे सारा ध्यान मेरी तैयारी पर सिमट, मैंने कर अध्यापन कार्य आरंभ किया, कोई एक सप्ताह बाद मेरी उनसे पुनः भेंट हुई तब और अब में मैंने अंतर देखा अब स्वर कहीं विनम्र था, पहले की बात जो कि मुझे ज्यों की त्यों याद थी मैंने उनसे उनकी समीक्षा की बात की, प्रफुल्लित होकर उन्होंने कहा " सबसे अच्छी आपकी आवाज और आपके पढ़ाने का अंदाज़", दृष्टिकोण बदलते समय नहीं लगता, ये अब मैं समझ गईं थी, प्रयास अति महत्वपूर्ण हैं तो सही दिशा भी!
 मेरे विचार में छात्रों को माध्यस्थम अभिकरण का दौरा अपने शिक्षण काल मे अवश्य करनी चाहिए, जिला एवं सत्र न्यायालय से भी जरूर शिक्षा ग्रहण करना चाहिए। मूल ज्ञान के लिए सर्वप्रथम विधि की शिक्षा हेतु छात्रों को अधिकाधिक धैर्य और विनम्रता का अभ्यास करना आवश्यक है, बहुतायत यह कहा जाता हैं कि अधिवक्ता सफलता के लिए दसियो वर्ष तक निरंतर संघर्ष करते हैं, वकालत के लिए सर्वप्रथम स्वयं के भाषा का उच्च ज्ञान आवश्यक हैं, एवं विधियों का, नए न्याय दृष्टान्तो का प्रकरण अनुसार प्रयोग करना, बिना संकोच के न्यायधीशों के समक्ष वादी का पक्ष रखना, वादी से उसके प्रकरण के पूर्ण संसूचना का फ़ाइल बनाना, ऐसे नैदानिक कार्य जो केवल न्यायालयों में सिखाये जा सकते हैं, मेरी इच्छा है कि अधिकाधिक महाविद्यालयों में यह शिक्षण सामग्री विस्तृत रुप मे पढ़ाई जाए जहां केवल मूट कोर्ट के विषय अप्रभावी है।
 मुख्य रूप से मैंने वक्ता बनना सीखा है, मुझे कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों में मंच सम्भालने, गीत गाने, अथवा प्रमुख बनाया गया, मूट कोर्ट मे न्यायाधीश बनने का भी मुझे अवसर मिला।
चूंकि वकालत केवल व्यवसायिक उद्देश्य तक सीमित नहीं हैं मेरे प्रयास ना केवल पाठ्यक्रम पूर्ण हो जाने तक था बल्कि मैंने सभी छात्र- छात्राओं को मार्गदर्शन देने से कभी नहीं नकारा।
मेरी पढ़ाई जिस कक्षा में होती थी वहां आज मैं पढ़ा रही थी, अब दुनिया सचमुच गोल लगती थी, वैसे, केवल भौतिक विज्ञान का प्रभाव नहीं बल्कि जब हम कहते हैं कि दुनिया गोल है, तब इसका तात्पर्य कर्मों से माना जाता हैं। एल एल०बी में उम्र आधारित रोक कई बार लागू हो कर खत्म की जा चुकी है, कभी ३० वर्ष के आयु के भीतर कर सकते है, कभी ३० वर्ष के पश्चात नहीं कर सकते, फिलहाल कोई रोक नहीं, है, कई मर्तबा यह टिप्पणी सुनी होगी कि अदालतों में भीड़ अत्यधिक है, अतः कम की जानी चाहिए, माफ कीजियेगा ये प्रकरणों अथवा वादग्रस्त प्रार्थियों से नहीं उलट वकीलों से हैं, सिद्धांत अनुरूप ये कहा जाए कि कम योग्य की बलि दी जा सकती है, तो कहीं बेहतर होता सब प्रकार के विवाद को ठंडा पानी डालते हुए ऑल इंडिया बार ने ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन के आयोजन का फैसला लिया जो वर्ष में दो बार होता है, वर्तमान में पहले इसके लिए उच्च न्यायालय से पंजीयन कराना जरूरी है, जिसके बाद इस का फॉर्म भरा जा सकता है, वैसे यह एक मुक्त परीक्षा है, मुझे मेरे कई छात्र छत्राओं के माध्यम से पता चला कि यहां सब छात्र छात्राएं एक बड़े सूट केस जिसमे ब्रीफ केस से लेकर टूरिस्ट बैग तक लाये जाते है, जिसमे होता क्या है, नहीं परीक्षा केंद्र पर्यटन केंद्र नहीं है, इसमें उनके किताब और अन्य नोट्स होते है, उत्तीर्ण होने के लिए निर्धारित क्रमांक ३५-४० तक जाता है, कहिए फिर ऐसे कठोर नियम से भीड़ तो अवश्य कम होगी।

न्यायाधिपति जस्टिस ठाकुर ने केरल के बार कौंसिल के कार्यक्रम में कहा था यह पेशा पहचान के साथ धन और पुरस्कार में भी लाभ देता हैं। सही। हाल ही मे अखबार में आया था की जिला अदालत में दो वर्ष के अनुभवी वकीलो को उच्च न्यायालय में कार्य करने की अनुमति होनी चाहिए यह केवल एक सिफारिश थी हालांकि।

मैं हिंदी माध्यम की होने के वजह से हिंदी में तो मैं प्रखर हूँ अंग्रेजी और अन्य विद्यार्थी जो हिंदी के आदी नहीं है, के लिए मैने बेयर एक्ट के सहारा लिया, ग्रंथालय प्राचीन होने के कारण अधिकाधिक पुस्तके हिंदी भाषा मे उपलब्ध थी, वह भी उनके पुराने संस्करण। 

जैसे,

 16. "Undue influence" defined - (1) A contract is said to be induced by "undue influence" where the relations subsisting between the parties are such that one of the parties is in a position to dominate the will of the other and uses that position to obtain an unfair advantage over the other

१६. " असम्यक" असर की परिभाषा- (१) संविदा असम्यक असर द्वारा उत्प्रेरित कही जाती हैं जहाँ की पक्षकारो के बीच विद्यमान सम्बन्ध ऐसे हैं कि उनमें से एक पक्षकार दूसरें ओशकार की इच्छा को अधिशासित करने की स्तिथि में हैं और उस स्तिथि का उपयोग उस दूसरे पक्षकार से अऋजु फायदा अभिप्राप्त करने के लिए करता है।



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इसकी तीन आवश्यकता है

१. दो पक्षों में से एक पक्ष की स्तिथि दूसरे पक्ष के मतांतर करने की हो

२. वर्चस्व रखने वाले पक्ष अन्य पक्ष पर अन्यायपूर्ण बढ़त रख सकें

३. और वर्चस्व रखने वाले पक्ष ने अपनी प्रभुता बनाई हो।

या

विश्वास अधिकृत व्यक्ति जिसका प्रभुत्व स्थापित हो, से भय या रौब हो, जिसमे उसके इच्छाविरुद्ध कार्य करवाये गए हो।
शनै शनै विस्तार होता गया और आज मैं अनुभवों से धनी हूं।

सीमा शर्मा 

पाठकों आज के लिए इतना ही, इस श्रृंखला का उद्देश्य  ना केवल मेरे वेबसाइट का विस्तार करना है बल्कि अपने वेबसाइट के माध्यम से स्वयं के पृष्ठभूमि और अनुभव से प्रेरित करना भी है। शीघ्र ही आगामी पोस्ट प्रेषित करने का प्रयास करूंगी। धन्यवाद।


Face book link: Seema Sharma As Blogger






 


रविवार, 30 जुलाई 2023

शायरी, दर्द का बंटवारा, युवा और खैर खवाह

दोस्तो आज पेश है मेरी कलम से लिखी एक शायरी, जिसे मैंने सबसे पहले Your Quote App पर सन् २०२० में लिखा था, जिसे आज मैं अपने ब्लॉगिंग साइट पर शेयर कर रही हूं।

—सीमा शर्मा 

शायरी

दर्द का बंटवारा
तक़दीर से लिखे फलसफे के खत पढ़ी जाती हूँ, 
आजकल रोने को मैं गुनगुनाकर सुनाती हूँ, 
तेरी दौलत कहती है,
 तेरे दर से,
किसी कलपते का, 


आना जाना लाजिमी है,
कल ही देख, 
टूटते कदम और टपकती आंसू, 
खुदाई की सोचती हूँ, आसमानी तख्त पर अटूट,
किसी को यकीं  जरूर होगा, 
तेरी बेइंसाफी देख लगता हैं, 
तूने उसके ख्वाब किसी दिन रौंदा जरूर होगा, 
तू भी रुक के देखना, 
तेरे किसी शीशमहल के तले उसका घरौंदा जरूर होगा, 
और,


तेरे सताये से क्या फरमाऊं,
 'सुन ऐ गैरत-दार, 

जो खुदाई करने से तू न हारे, 
तो आगे भी तू न किया बिगाड़,

बस रह सब्र थाम, 
कभी उसी छीनने वाले से ही सुना है, 
रहम फरमाना ही है,
उस सबक़त का काम।

—सीमा शर्मा 


युवा

नई शक्लें बनाते हैं,
मानचित्र में ये नौका चलाते है,
दूर दूर जो हिलोरे खाते है,
वो सागर भी स्वप्न भीगा जाते है, 
कल्पना की दुनिया हैं,
 वो बबलू हैं, वो मुनिया हैं,
खेल खेल में मेरे शहर घुम आते हैं,
 ओ नगर थोड़े और हुए हो विस्तृत
 तो रास्ता छोटा रखना 
मेरी उम्र ज्यादा हो गई हैं।

—सीमा शर्मा



ख़ैर ख्वाह

तेरे लिए दुआ माँगी,
कबूल काबिलियत हुई,
 तेरे लिए आसमान मांगा,
 कबूल, 
उड़ान हुई,
 मांग रही थी, 
ऊंचाई, 
कबूल हिफाजत हुई!

—सीमा शर्मा 



©Seema Sharma
Copyright 2020-2023




लघुकथा अंक द्वितीय, निरीह आंखे, प्रेम, पुराना रूप और दो गली ज्यादा

भूमिका

मित्रो पिछले अंक में अपने पढ़ा था लघुकथा अंक एक जिसमे कई भिन्न भिन्न परिवेश को इंगित करती लघु कथाएं थी, आशा करती हूं आपने वह पूरा पढ़ा हो🙏, 
इस अंक में पढ़िए लघुकथा अंक दो, कृपया इसे भी पूरा अवश्य पढ़े और ऑडियो सुनने के लिए दिए गए लिंक में भी जाएं, पिछले अंक को आप सब का बहुत सहयोग मिला, जिसके लिए मैं आप सब का धन्यवाद करना चाहती हूं।

—सीमा शर्मा 

लघुकथा अंक दो

१). निरीह आंखे


" अपने मन की मनमानी करते हुए, तुमने पहले ही काफी नुकसान कर दिया है !"
 "मेरे नाम की संपत्ति को मैं राख कर दूं तो क्या !"
 (उसने ऐंठ कर कहा) 


पर्दे के आड़ लिए दो निरीह आंखे कभी कुपित मां को देखते थे, कभी पिता को ।

(लघुकथा)



२.). प्रेम  
"माफ़ कर दीजिए आगे से नहीं करेगा",
"इतनी दीनता ही दिखा कर अपने बेटे को नियंत्रित कर लेते तुम, ...मैं नशे में नहीं हूं, सो माफ करूं, हूं, तुम किस नशे में रहते रहे?"

"प्रेम"

 (निराशा भरे स्वर में वह वही बैठ गया)

(लघुकथा)


३.). पुराना रूप

"हमारा भी हिस्सा है बराबर का"

 तन कर खड़ा बेटा, बहन की तरफ देख भी 
नहीं रहा था। पसोपेश में फंसे पिता बेटे के जगह अपने 
25 साल पुराने रूप को देख रहे थे।

(लघुकथा)


४.).दो गली ज्यादा

"आपकी दुकान उधर होगी ये सोचकर मैं दूसरे रास्ते से मुड़ गई.... भईया के साथ ही सही पते पर आई हूं", मालती ने कहा


 "ओह, वैसे मेरी दुकान से घर पहुंच सेवा भी है।" :दुकानदार 

मुहाने खड़ी वह एक टक निहारने वाली आंखे फिर घूर रही थी।


 (ऐसे रास्ते की गवाही धूल धूसरित, कहीं पड़ी नहीं है, उन लाखों मुड़ते हुए कदमों के हवाले है, जो किसी न किसी, नजर के कारण, दो गली ज्यादा चल नहीं सकती।)

(लघुकथा)





पाठको आज के लिए इतना ही, मिलेंगे नए अंक में नए लघुकथाओ के साथ एक नए पोस्ट में, मित्रों मेरे विषय में आप मेरे वेबसाइट के विषय के कॉलम में जा कर पढ़ सकते है, मैं एक प्राध्यापिका हूं विधि महाविद्यालय में पिछले १९ वर्षो से अध्यापन कार्य से जुड़ी हूं, मैं मूलतः राजनांदगांव में जन्मी थी मेरी शिक्षा भूमि बिलासपुर है कर्मभूमि दुर्ग, छत्तीसगढ़, और मेरा ससुराल रायपुर में मैं अपने पति और बच्चों के साथ रायपुर छत्तीसगढ़ में रहती हूं।

©Seema Sharma
Copyright 2023
©सर्वाधिकार सुरक्षित 

बुधवार, 26 जुलाई 2023

लघुकथा अंक प्रथम, कमी और बुदबुदाहट

लघुकथा अंक




कमी


"अब....अब
ये किसकी कमी है",

"आप तो जानते ही है!",

ऐसा निम्न स्तर का काम?", 
"मैं जानता हूं? अं हां हां, दूगुने पगार पर भी.. किसी और को ढूंढ लाओ" 
"जी"

‘मास्टर्स इन जी हुजूरी’ 

(वह मन में बुदबुदाया)

(लघुकथा)

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बुदबुदाहट


"क्यूं बार बार खिलना
जब हैं मिट्टी में मिलना "

"ये कैसी, अजीब तुकबन्दी कर रहे,
 कितनी मुर्दनगी हैं इसमें!" 
उसने आगे कहा: "क्यूँ इतना सता रहे हो, 
बीती जो मुझपे उसे तुम क्या - क्या बता रहे हो",



उसने फिर टोका "कुछ खैर ढ़ाओ ! और आंसू मत बरसाना!"

 मगर उसने कहना जारी रखा, "ठीकरा सितारे से टूट गिर रहा,
 उम्र कोई और जिये, "मर में रहा", वह उसे और टोकता पर तब
 तक बेकार बुदबुदाहट धीरे-धीरे बन्द हो चुकी थी।

 (लघुकथा)

Seema Sharma
©सर्वाधिकार सुरक्षित 

Copyright: 2020-2023

शनिवार, 22 जुलाई 2023

अमरनाथ यात्रा

अमरनाथ यात्रा 







"ऋषि भृगु पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अमरनाथ की खोज की थी।
ऐसा माना जाता है कि कश्मीर की घाटी पानी के भीतर डूबी हुई थी, और ऋषि कश्यप ने इसे नदियों और नहरों की एक श्रृंखला के माध्यम से सूखा दिया था। परिणामस्वरूप, जब पानी सूख गया, तो भृगु अमरनाथ में शिव के दर्शन करने वाले पहले व्यक्ति थे।
कालांतर में यह सनातन विश्वासियों के लिए भगवान शिव का निवास और वार्षिक तीर्थस्थल बना।"


मित्रों इस पोस्ट में पढ़े अमरनाथ यात्रा से संबंधित जानकारी

वर्ष की प्रतीक्षित यात्राओं में से एक, अमरनाथ यात्रा हिंदू कैलेंडर के श्रावण माह के अनुसार जुलाई से अगस्त के महीनों में आयोजित की जाती है।अमरनाथ की यात्रा 30 जून से शुरू हो चुकी है और 11 अगस्त तक चलेगी. हर साल लाखों लोग बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए अमरनाथ यात्रा पर जाते हैं. कहा जाता है कि अमरनाथ धाम के गुफा में भगवान शिव ने माता पार्वती को अमर होने का रहस्य बताया था. इस रहस्य को बताने के लिए वो एकान्तवास की खोज कर रहे थे. तब उन्होंने अपने सभी प्रिय जनों को त्याग 
दिया। 

ऋषि भृगु पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अमरनाथ की खोज की थी।
ऐसा माना जाता है कि कश्मीर की घाटी पानी के भीतर डूबी हुई थी, और ऋषि कश्यप ने इसे नदियों और नहरों की एक श्रृंखला के माध्यम से सूखा दिया था। परिणामस्वरूप, जब पानी सूख गया, तो भृगु अमरनाथ में शिव के दर्शन करने वाले पहले व्यक्ति थे।
कालांतर में यह सनातन विश्वासियों के लिए भगवान शिव का निवास और वार्षिक तीर्थस्थल बना।


ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव ने अपने वाहन नंदी बैल को पहलगाम (बैल गांव में छोड़ दिया था। चंदनवारी में, उन्होंने चंद्रमा को अपने बालों (जटा) से मुक्त किया। जहां उन्होंने अपने अनंत नामक नाग को त्यागा, वह स्थान अनंतनाग और जहां शेष नामक नाग को छोड़ा, वह शेषनाग नाम से विख्यात है

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महागुणस पर्वत


शेषनाग झील के बाद महागुणस पर्वत का पड़ाव आता है. यहां शिव जी ने अपने पुत्र गणेश को स्थान दिया था. इस स्थान को गणेश टॉप के नाम से भी जाना जाता है. कहा जाता है कि ये स्थान अत्यंत सुंदर और मन को मोहित करने वाला है. इस स्थान को महागणेश पर्वत भी कहा जाता है.पंचतरणी में, शिव ने पांच तत्वों पृथ्वी, जल, वायु, - अग्नि और आकाश को त्याग दिया। सांसारिक संसार के त्याग के प्रतीक के रूप में, भगवान शिव ने तांडव नृत्य किया, अंततः, भगवान शिव ने माता पार्वती के साथ अमरनाथ गुफा में प्रवेश किया, वहां भगवान ने माता पार्वती को अमर कथा सुनाई पर वह पूरी अमर कथा नहीं सुन पाई क्योंकि उन्हें नींद आ गई थी, किंवदंतियों के अनुसार वह कथा 2 कबूतरों ने सुनी थी जो वहां उपस्थित थे (किंवदंतियों का कहना है कि वे दोनों कबूतर अभी भी वहां है)


श्रद्धालू शांति, ज्ञान, समृद्धि और सबसे महत्वपूर्ण रूप से सर्वोच्च भगवान शिव का आशीर्वाद पाने के लिए आध्यात्मिक अमरनाथ यात्रा मार्ग पर एक जुलाई से निकले है
बाबा बर्फानी की गुफा तक पहुंचने के दो रास्ते हैं। पहला पहलगाम, यह पारंपरिक मार्ग है, जिस पर चढ़ना आसान है। करीब 47 किलोमीटर के इस रास्ते को तय करने में 2 से 3 दिन का समय लगता है।

दूसरा रास्ता बालटाल से होकर जाता है। यह एक नया ट्रैकिंग रूट है, जो 14 किमी का है, जो पहलगाम के आधे से भी कम है। इस पर एक दिन में चढ़ाई की जा सकती है।गुरुवार को 4,600 से ज्यादा यात्री अमरनाथ के लिए रवाना हुए थे


देशभर से रोजाना हजारों श्रद्धालु बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। मौसम भी भोले के भक्तों के लिए अनुकूल रहा। यह यात्रा पारंपरिक बालटाल और पहलगाम से जारी है। गुरुवार को बम-बम भोले और जय शिव शंकर के जयकारों के बीच 8574 श्रद्धालुओं ने बाबा बर्फानी के दरबार में हाजिरी लगाई। इसके साथ ही कल श्रद्धालुओं की संख्या तीन लाख को पार कर गई.


शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

गांधी जयंती (क्रमशः)

बापू 

द्वितीय

बापू के प्रिय भजन**
हरि, तुम हरो जन की भीर।
द्रौपदी की लाज राखी, तुम बढ़ायो चीर।
भक्त कारन रूप नरहरि, धरयो आप सरीर।
हरिनकश्यप मार लीन्हो, धरयो नाहिन धीर,
बूड़ते गजराज राख्यो, कियो बाहर नीर।
दासि मीरां लाल गिरधर, दुख जहां तहां पीर।

गांधी जी के एकादश व्रत**

जिसमे सत्य को परमेश्वर कहा, सत्य आग्रह सत्य विचार, सत्य वाणी और सत्य कर्म, अहिंसा: बिना अहिंसा के सत्य की खोज असंभव हैं, ब्रह्मचर्य: न केवल जनेन्द्रिय बल्कि सर्वेन्द्रीय पर नियंत्रण, अस्वाद: भोजन शरीर पोषण के लिए होना चाहिए, अस्तेय: (चोरी न करना) दूसरे की वस्तु लेने के अलावा आवश्यकता से अधिक संग्रह करना चोरी है, अपरिग्रह: धन संबंधी न होकर विचार और इच्छापूर्वक परिग्रह कम करना, इसके कम होने से सुख और सच्चा संतोष बढ़ता है, सेव शक्ति बढ़ती है, अभय: जो सत्यपरायण रहे वह न तो जात बिरादरी से डरे न सरकार से चोर बीमारी मौत से न डरे, न किसी के बुरा मानने से डरे, अस्पृश्यता निवारण: प्रत्येक हिन्दू का धर्म कर्तव्य हैं कि छुआछूत का निवारण करे, शरीर श्रम: बिना कारण दुसरो से सेवा न लेते हुए जिनका शरीर खुद काम ले सकता हैं, सारे काम खुद करना चाहिए, सर्वधर्म समभाव: सभी धर्मों का बराबर सम्मान करना चाहिए तथा प्रार्थना करनी चाहिए कि सभी धर्मों के दोष दूर हो जाए, स्वदेशी: अपने आसपास रहने वालों की सेवा में लीन होना स्वदेशी धर्म हैं, जो निकट के लोगो के सेवा छोड़ कर दूर के लोगो की सेवा करने दौड़ता है वह स्वदेश भंग करता हैं।

रचनात्मक कार्यक्रम

रचनात्मक कार्यक्रम को सत्य और अहिंसात्मक साधनों द्वारा पूर्ण करना स्वराज्य की रचना कहा जा सकता है। ....उसके एक एक अंग पर विचार करें।

कौमी एकता- एकता का मतलब सिर्फ राजनैतिक एकता नहीं है।.... सच्चे मानी तो हैं वह दिली दोस्ती, जो तोड़े न टूटे। इस तरह की एकता पैदा करने के लिए सबसे पहली जरूरत इस बात की है कि कांग्रेसजन, वे किसी भी धर्म के मानने वाले हों, अपने को हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी- सभी कौमो का नुमाइंदा समझें।

अस्पृश्यता निवारण- हरिजनों के मामले में तो हरेक हिन्दू को यह समझना चाहिए कि हरिजनों का काम उसका अपना काम है।

मद्य निषेध- अफीम, शराब, गांजा वगैरा चीजो के व्यसन में फंसे हुए अपने करोड़ो भाई बहनों के भविष्य को सरकार की मेहरबानी या मर्जी पर झूलता नहीं छोड़ सकते। इन व्यसनों के पंजे में फंसे हुए लोगो को छुड़ाने के उपाय निकालने होंगे।

खादी- खादी का मतलब है देश के सभी लोगो की आर्थिक स्वतंत्रता और महानता का आरंभ। खादी में जो चीजें समाई हुई हैं, उन सब के साथ खादी को अपनाना चाहिए। खादी के एक मतलब यह है कि हममें से हरेक को सम्पूर्ण स्वदेशी की भावना बढ़ानी और टिकानी चाहिए।

दूसरे ग्रामोद्योग- हाथ से पीसना, हाथ से कूटना और पछोरना, साबुन बनाना, कागज बनाना, दियासलाई बनाना, चमड़ा बनाना, तेल पेरना और इस तरह के दूसरे सामाजिक जीवन के लिए जरूरी और महत्व के धंधों के बिना गांवों की आर्थिक रचना सम्पूर्ण नहीं हो सकती।

गांवों की सफाई: देश मे जगह जगह सुहावने और मनभावने छोटे-छोटे गांवों के बदले हमें घूरे जैसे गांव देखने को मिलते हैं।.....हमारा फर्ज हो जाता है कि गांवों को सब तरह से सफाई के नमूने बनावें।

बुनियादी तालीम- बुनियादी तालीम हिंदुस्तान के तमाम बच्चों को, वे गांवों में रहने वाले हो या शहरों के, हिंदुस्तान के सभी श्रेष्ठ तत्वों के साथ जोड़ देती है। यह तालीम बालक के मन और शरीर दोनो का विकास करती हैं।

प्रौढ़ शिक्षा- बड़ी उम्र के अपने देशवासियों को जबानी, यानी सीधी बातचीत द्वारा सच्ची राजनैतिक शिक्षा दी जाय।

आरोग्य के नियमो की शिक्षा- हमारे देश की दूसरे देशों से बढ़ी-चढ़ी मृत्यु संख्या का ज्यादातर कारण निश्चय ही गरीबी है, जो देशवासियों के शरीर को कुरेदकर खा रही है; लेकिन अगर उनको तन्दरूस्ती के नियमो की ठीक-ठीक तालीम दी जाय, तो उसमें बहुत कमी की जा सकती है। जब बीमार पड़े तब  अच्छे होने के लिए अपने साधनों की मर्यादा के अनुसार प्राकृतिक चिकित्सा करें।

प्रांतीय भाषाएं- हिंदुस्तान की महान भाषाओं की अवगणना की वजह से हिंदुस्तान को बेहद नुकसान हुआ है, उसका कोई अंदाजा हम नहीं कर सकते।.....जब तक जनसाधारण को अपनी बोली में लड़ाई के हर पहलू और कदम को अच्छी तरह से नहीं समझाया जाता, तब तक उनसे यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे उसमे हाथ बटायेंगे।

राष्ट्रभाषा- समूचे हिंदुस्तान के साथ व्यवहार करने के लिए हमको भारतीय भाषाओं में से एक ऐसी भाषा की जरूरत है, जिसे आज ज्यादा-से-ज्यादा तदाद में लोग जानते औऱ समझते हों, बाकी के लोग जिसे झट सीख सकें और वह भाषा हिन्दी (हिंदुस्तानी) ही हो सकती है।

आर्थिक समानता- आर्थिक समानता के लिए काम करने का मतलब है पूंजी और मजदूरों के बीच के झगड़ों को हमेशा के लिए मिटा देना।....अगर धनवान लोग अपने धन को और उसके कारण मिलने वाली सत्ता को खुद राजी-खुशी से छोड़कर और सबक कल्याण के लिए सबों के साथ मिलकर बरतने को तैयार न होंगे, तो यह सच समझिए कि हमारे मुल्क में  हिंसक और खूंखार क्रांति हुए बिना नहीं रहेगी।

किसान- स्वराज्य की इमारत एक जबरदस्त चीज़ है, जिसे बनाने में अस्सी हजार करोड़ हाथों के काम है। इन बनाने वालों में किसानों की तादाद सबसे बड़ी हैं। सच तो यह है कि की स्वराज्य की इमारत बनाने वालों में ज्यादातर(करीब ८० फीसदी)  वे ही लोग हैं, इसलिए किसान ही कांग्रेस है, ऐसी हालत पैदा होनी चाहिए।

मजदूर- अहमदाबाद के मजदूर-संघ का नाम समूचे हिंदुस्तान के लिए अनुकरणीय है क्योंकि वह अशुद्ध हिंसा की बुनियाद पर खड़ा है।... मेरा बस चले तो हिंदुस्तान की सब मजदूर संस्थाओं का संचालन अहमदाबाद के मजदूर-संघ की नीति पर करूं।

आदिवासी- आदिवासियों की सेवा भी रचनात्मक कार्यक्रम का एक अंग है ।....समूचे हिंदुस्तान में आदिवासियों की आबादी दो करोड़ है।.... उनके लिए कई सेवक काम कर रहे हैं फिर भी उनकी संख्या काफी नहीं है।

कुष्ठ रोगी- यह एक बदनाम शब्द है। फिर हममें जो सबसे श्रेष्ठ या बढ़े- चढ़े है, उन्ही की तरह कुष्ठ रोगी भी हमारे समाज के अंग हैं। पर हकीकत यह है कि जिन कुष्ठ- रोगियों को सार-संभाल कि सनसे ज्यादा जरूरत है,  उन्हीं को हमारे यहां जान-बूझकर उपेक्षा की जाती है।

विद्यार्थी- विद्यार्थी भविष्य की आशा है।....इन्हीं नौजवान स्त्रियों और पुरुषों में तो राष्ट्र के भावी नेता तैयार होने वाले हैं विद्यार्थियों को दल बंदी वाली राजनीति में कभी शामिल नहीं होना चाहिए उन्हें   राजनैतिक हड़तालें नहीं करनी चाहिए। पहनने-ओढ़ने के लिए वे हमेशा खादी का इस्तेमाल करें।

स्त्रियां- स्त्री को अपना मित्र या साथी मानने के बदले  पुरुष ने अपने को उसका स्वामी माना है। कांग्रेस वालों का यह खास कर्तव्य है  कि हिंदुस्तान की स्त्रियों का इस गिरी हुई हालत से हाथ पकड़ कर ऊपर उठावें।

गो-सेवा-  गोरक्षा मुझे बहुत प्रिय है। मुझसे कोई  पूछे कि हिंदू धर्म का बड़े-से-बड़ा ब्रह्म स्वरूप क्या है तो मैं गौ रक्षा बताऊंगा। मुझे वर्षों से  दिख रहा है कि हम इस धर्म को भूल गए हैं। दुनिया में ऐसा कोई देश मैंने नहीं देखा, जहां गाय के वंश की, हिंदुस्तान जैसी लावारिस हालत हो।

‘इस अपढ़, अनगढ़ लेकिन निश्चयी किसान ने मुझे जीत लिया.’

अपने सत्य के प्रयोग में गांधी जी ने इस पर लिखा है।***

जबरन नील की खेती कराए जाने से किसानों चंपारण, बिहार के  पश्चिमोत्तर में स्थित, किसान खाद्यान्न के स्थान पर नील के खेती को मजबूर थे, लखनऊ अधिवेशन में मिले एक किसान राजकुमार शुक्ल ने महात्मा गांधी से आग्रह किया कि वह स्वयं वहां आकर का हाल देखे, पहले इस पर प्रताप के संपादक श्री गणेशशंकर विद्यार्थी नील की खेती पर कई ज्वलंत लेख लिख चुके थे, कांग्रेस ने लखनऊ अधिवेशन में प्रस्ताव पारित किया उससे भी राजकुमार शुक्ल सन्तुष्ट नहीं हुए और गांधी जी को वहाँ स्वयं चल के जाने का आग्रह किया।

१० अप्रैल १९१७ को वहाँ पहुंचे, फिर जो हुआ वो इतिहास है, अफ्रीका में अपनाए सत्य और अहिंसा के हथियार गांधीजी ने पहली बार भारत मे प्रयोग किया, पीड़ित किसानों के बयान कलमबद्ध किये गए , ध्यान रहे इसमें कांग्रेस की सहायता नहीं ली गयी थी, जनता का जबरदस्त सहयोग था। चार माह के बाद यह रंग ले आया, और धीरे धीरे १३५ साल पुरानी नील की खेती बन्द हो गयी। 

वें जमींदार निलहे साहब के नाम से प्रसिद्ध थे। जब गांधी जी १९१७ मे वहां जांच करने गए तो उन्हें सरकारी सूचना मिली कि वह चंपारण से निकल जाए, गांधी जी ने इनकार कर दिया, अंग्रेजी सरकार ने उनपर मुकदमा चलाया, गांधी जी ने निधड़क सच कह कर स्वीकार किया कि सरकारी आदेश की जानबूझकर उन्होंने तामीली नहीं की, सरकार पर  उनके सत्याग्रह का असर हुआ और उनकी शिकायतें सुनी गई।****






                                                                                      

**गांधी डायरी, सस्ता साहित्य मण्डल

***विकिपीडिया

****भारत के गौरव (पांचवा भाग)

                                                                                       

क्रमशः......

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गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

गांधी जयंती

बापू

प्रथम

गांधी जी व्यक्ति से ऊपर एक संस्था हैं, सर्वोदय के अग्रदूत गांधी जी का जन्मदिन २ अक्टूबर १८६९ को पोरबंदर में हुआ, 

गांधीजी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी है, उनके पिता जी का नाम करम चंद गांधी था, तथा माता का नाम पुतली बाई।

गांधी जी की आरंभिक शिक्षा पोरबंदर में हुई, उस समय के अनुरूप उनका विवाह १४ वर्ष की आयु में  कस्तूरबा के साथ हो गया था। वर्ष १८८८ में यह शिक्षा हेतु गांधीजी विलायत गए थे, वर्ष १८९१ में गांधी जी बैरिस्टर बन कर बम्बई लौटे थे, जहाँ वह प्रैक्टिस करने लगे, १८९३ में एक दीवानी मुकदमे में जब गांधी जी दक्षिण अफ्रीका गए, जिसका फैसला वर्ष १८९४ में समझौते का हुआ, वर्ष १८९५ में गांधी जी नटाल के उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता के रूप में नामांकित हुए, तथा वहाँ नेटाल भारतीय कांग्रेस का गठन किया। बाल गंगाधर तिलक, एवं गोपाल कृष्ण गोखले और नेताओं से गांधी जी वर्ष १९०६ में मिले, जब वह मात्र ६ माह के लिए आये थे, उनके गतिविधियों से चिढ़े हुए अंग्रेजो ने गांधी विरुद्ध प्रदर्शन किए, इस उम्मीद में कि अंग्रेज भारतीयों के प्रति नरमी रखेंगे, वहां रहने वाले ३०० आम भारतीय ८०० बंधुआ भारतीयों जिनको गिरमिटिया कानून के बतौर गुलामी करने लाया गया था, के मदद से एम्बुलेंस सेवाओ में अंग्रेजी सरकार की बोअर युद्ध* में मदद किया।**

वर्ष १९०१ में वह राजकोट, भारत लौटकर आये तथा महामारी प्लेग से पीड़ित जगहों में जन सेवा का गठन किया, तथा दिसंबर में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में शामिल हुए। तीन माह पश्चात गांधी जी पुनः अफ्रीका लौट गए जहाँ १९०३ में उन्होंने  ट्रांसवाल ब्रिटिश इंडिया और इंडियन ओपिनियन नाम से संस्था स्थापित किया, १९०६ में हुए ज़ुलु विद्रोह जिसमे ज़ुलु के नेतृत्व ने और अतिरिक्त कर देने से मना किया था, उसी का नतीजा था, जिसमे गांधी जी ने अंग्रेजो से नेटल में रहते समय अपने द्वारा सहयोग की बात उस समय के तत्कालीन गवर्नर से की जिसे मानते हुए गांधी जी और अन्य सहयोगियों को घायल ज़ुलु लोगो की सेवा सुश्रुषा के लिए दिया गया क्योंकि गोरे सवयंसेवक इस कार्य के लिए तैयार नहीं थे, गांधी जी के व्यवहार से वह सभी बेहद प्रभावित हुए, गांधी जी लियो टॉलस्टॉय की रचनाओं से बहुत प्रभावित थे, और टॉलस्टॉय के नाम पर एक आश्रम आरम्भ किया जहां वह भारतीयों के विरुद्ध होने वाले अत्याचार पर सत्याग्रहका केंद्र  बना।

सन् १९१४ में लंदन में सरोजिनी नायडू से गांधी जी की पहली भेंट हुई जब वह उनसे मिलने गई तो उन्होंने यह देखा कि एक विश्वप्रसिद्ध नेता जो  दक्षिण अफ्रिका से अंग्रेजो से  सीधी टक्कर ले कर आ रहा है, वह काफी साधारण अवस्था मे एक लकड़ी के कटोरे में अत्यंत साधारण सा भोजन कर रहा है, तो उनकी हँसी छूट गईं, आंख उठा कर गांधी जी उन्हें देख वह भी बड़े जोर से हँसे और

 पहचान लिया।●●●

वह बाद में गांधी जी के विचारधारा में कदम कदम चलती रही तथा समर्थक रही, सामान्य घर गृहस्थी छोड़ कर भी गांधी जी के पीछे पीछे जेल गईं, जब वह जेल में नहीं होती थी तब सामाजिक कार्यों में सलग्न रहती थी।

भारत लौटे गांधी जी को सन् १९१५ में केसर-ए-हिन्द का खिताब दिया गया था, यहां से गांधी जी भारत भ्रमण पर निकले गांधी जी से तब काका कलेलकर(दत्तात्रेय बालकृष्ण कलेलकर) से और आचार्य जे बी कृपलानी(जीवतराम भगवान दास कृपलानी) से हुई, काका कलेलकर इसके पश्चात वह गांधी जी से प्रभावित हो कर साबरमती आश्रम के सदस्य बने तथा सर्वोदय में संपादकीय भूमिका निभाई। काका कलेलकर ने गांधी जी से प्रभावित हो कर अहमदाबाद में गुजरात विद्यापीठ की स्थापना की।**

जे बी कृपलानी, देशभक्त के साथ एक समाजवादी और पर्यावरणविद थे, तथा गांधी जी के  शिष्य और विचारों के घोर समर्थक थे।**

सन् १९१९ से गांधी जी ने पत्रिकाओं यंग इंडिया और नवजीवन का संपादन कार्य किया था। पं. जवाहर लाल नेहरू से गांधी जी पहली भेंट १९१६ में काशी विश्वविद्यालय के स्थापना अवसर के बाद कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में हुई। स्थापना दिवस पर ६ फरवरी को जहाँ गांधी जी ने भाषण दिया और बहुत ही महत्वपूर्ण विषयों पर कहा जैसे कि हिंदी भाषा के ऊपर आंग्ल भाषा भाषण के लिए चुना जाना, वाइसराय हार्डिंग के लिए चाक चौबंद सुरक्षा होना, मंदिर के आसपास व्याप्त गन्दगी, विभिन्न महाराजाओं का आकंठ सोने से लदे रहना, जो कि दरिद्रों के शोषण का पर्याय है, उन्होंने स्वयं को अराजकतावादी घोषित किया, किसानो के उठ खड़े होने से भारत को मुक्ति मिलेगी आदि।उपस्थित राजाओ ने थोड़े देर के बाद बहिर्गमन कर दिया।

 नेहरू जी को वह अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी मानते थे, नेहरू ने इस विषय मे कहा है कि उस समय गांधी जी राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रियता न दिखाते हुए  भारतीयों के दक्षिण अफ्रिकाई मुद्दों पर जुड़े रहना चाहते थे।

०० सन् १९१७ में मुजफ्फरपुर बिहार में महात्मा गांधी की भेंट डॉ० राजेन्द्र प्रसाद से हुई, वह कलकत्ता कॉलेज से विधि स्नातक तथा कलकत्ता उच्च न्यायालय में अधिवक्ता थे, उन्होंने पत्रिका साप्ताहिक बिहार विधि की नींव रखी।

 डॉ० राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष और प्रथम राष्ट्रपति थे। वैसे भारतीय संविधान में राष्ट्रपति की उम्मीदवारी के क्रम में शाश्वत उत्तराधिकारी होने में कोई बाधा नहीं है, जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका में होता है, परन्तु इसमें डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने सबसे अधिक बार राष्ट्रपति बनने के बाद भी दुबारा पद में दावेदारी न रखने का उदाहरण रखा।

विचार 

सर्वोदय: इसका अर्थ सब का समान रूप से उदय हैं, यह शब्द पहली शताब्दी के जैन सन्त सुमन्तभद्र के कार्य से प्रेरित हैं, गुजराती में रूपांतरित  जॉन रस्किन के अन टू द लास्ट, "आखिरी व्यक्ति तक", से उत्प्रेरित गाँधी जी द्वारा एक फिनिक्स आश्रम स्थापित किया गया, सर्वोदय का अर्थ लोकनीति से है जो राजनीति से ऊपर रहेगा, यह एक आदर्श समाज की स्थापना करने वाला है जिसमे कोई जाति या वर्ग नहीं होगा, आधुनिक दर्शन के उलट जिसमे त्याग से ऊपर उपभोग और अधिक उपभोक्तावाद को तरजीह दी जाती हैं, गांधी जी के दर्शन सर्वोदय का कार्य शासन और आम जनता हर एक के ऊपर इस मंतव्य को और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी डालती है।

छत्तीसगढ़ में गांधी जी का प्रभाव

गोंड जाति के मांझी उपभाग की राजमोहिनी देवी इनमे से एक है, जब १९५१ के एक बहुत व्यापक भुखमरी और अकाल से क्षुब्ध यह बड़े चट्टान में आंख मूंद के बैठी थी तब इन्हें गांधी जी के विचार के प्रासंगिकता की अनुभूति हुई जिसके बाद इन्होंने २१ दिवस का उपवास किया और इसके बाद वर्षा हुई, इन्होंने बापू धर्म या सूरज धर्म की स्थापना की, इनके द्वारा स्थापित संस्था बापू धर्म सभा आदिवासी सेवा मण्डल के कार्य से इन्होंने खद्दर का प्रचार किया जो कि देशी बुनकरों द्वारा सृजन की हुई हो, मदिरापान को तम्बाकू सेवन को निषिद्ध किया गौ हत्या पर प्रतिबंध की बात कही, गांधी जी के विचारों की शिक्षाओं के प्रसार हेतु यह पैदल ही निकल पड़ी थी, इनके कार्य से जुड़ने वालो को भगत कहा जाता था।

                                                                                      

*बोअर: दक्षिण अफ्रीका के मूल डच निवासियों के वंशज थे। १८०६ में ब्रिटेन द्वारा कब्जाए जाने के बाद यह जनजातीय इलाको में पलायन कर गए और ट्रांसवाल ऑरेंज फ्री स्टेट की स्थापना की, १८६७ तक शांति रहने के बाद हीरे और सोने की खोज ने युद्ध की नींव डाली, (ट्रांसवाल: वाल नदी के उत्तर कई राज्य और प्रशासनिक संभाग आते थे, प्रिटोरिया जोहानसबर्ग) बोअर गणराज्य या ऑरेंज फ्री स्टेट क्या हैं? 

ऑरेंज एवं वाल नदी के मध्य स्थित होने से, ट्रांसवाल का अर्थ वाल नदी के उत्तर से है, या उसके पार, सन् १८९० में मामूली लड़ाई और १८९९ में पूर्ण पैमाने में युद्ध शुरू हुआ, फिर १९०० में उस पर ब्रिटेन का पूर्ण नियंत्रण आ गया, और १९०२ तक सारे विद्रोह कुचल दिए गए, तथा ३१ मई को सैन्य प्रशासन लागू कर दिया गया, सन् १९१० में नेटल एक प्रान्त था दक्षिण अफ्रीका के स्वायत्त संघ में।

                                                                                         

**संदर्भ: विकिपीडिया

•••संदर्भ: नेशनल हेराल्ड इंडिया, भारत के गौरव (आंठवा भाग)

००ब्रिटानिका

                                                                                              क्रमशः

देखिए कल, गांधी जयंती पर आगामी अंक।



महात्मा गांधी, जीवनी द्वितीय भाग












शनिवार, 15 अगस्त 2020

रायचंद, पंद्रह अगस्त पर

स्वतन्त्रता दिवस

 श्रृंखला
क्रमवार
१६०० से जो ईस्ट इंडिया कंपनी एक चार्टर के सहारे व्यापार करने आई थी, उसे १८५७ के ब्रिटिश राज के राज्य पूरे हो कर के दो टुकड़े में विभाजन करके  १९४७ में ही गई।आमतौर पर स्वतन्त्रता समर पर सभी वक्तव्य/लेख, शहादत से परिपूर्ण, और तमाम तरह की इच्छा, कई अन्य जनों की सुरक्षा, से भरपूर रहती है, यह भी कुछ इतना ही है,  ७४वें स्वतन्त्रता दिवस पर ला किले से झंडा फहराते हुए प्रधानमंत्री भाषण देंगे मगर सब कुछ मास्क नुमा दुनिया की तरह होगी सामाजिक दूरी के कड़ाई से पालन के साथ, कम मेहमान और बच्चों के बगैर पी.पी.ई. किट की सुरक्षा तले पूरी होगी, मौजूदा समय मे देशभक्ति से अर्थ देश के प्रति कृतज्ञता जताने से हैं, जो कि हम अपने कार्य:

एक तो उचित समय में कर के

दूसरे ईमानदारी से पूरा कर के आनंद ले सकते है,

कोरोना काल मे कोरोना वारियर्स पर संक्रमण के बराबर ही हमलवारों का खतरा देखते हुए धीरे-धीरे हम साल पूरा करते आ रहे है।

लाल किले में झंडा फहराया जाना देश के सभी प्रमुख स्थानों पर झंडावंदन फिर राष्ट्रीय गीत, राष्ट्रीय गान, सामान्यतया बहुत से स्थानों में मिष्ठान अन्य सामग्री वितरित की जाती है, कुछ अग्रदूत ऐसे भी हैं जो दुर्गम स्थल में जाकर के भी सेवा के किसी अवसर से नही चूकते, कुछ हाथ आया मौका भी गंवा देते है, आँचलिक जगहों में आज भी झंडे का प्रथम प्रवेश भी नहीं हुआ हैं।

१५ अगस्त के अलावा एक तारीख जिस दिन इंडिया इंडिपेंडेंस बिल, १९४८, लाया जाने वाला था उसमें ३ जून अंकित था। जब जापानी सेना ने समर्पण किया था, उसी तारीख के शुभ लक्षण के कारण या सन् १९४८ तक जिन्नाह का फेफड़े के कैंसर से ग्रस्त होना था, कारण?, जिससे विभाजन में समस्या ना आये।

अट्ठारह जुलाई, उन्नीस सौ सैंतालीस, को ब्रिटिश संसद ने इंडिया इंडिपेंडेंस अधिनियम, १९४७ पारित किया ताकि भारत और पाकिस्तान बन सके, पन्द्रह अगस्त से भारतीय रियासतों पर अंग्रेजी सरकार का अधिकार खत्म हुआ और सम्पूर्ण संप्रभु शक्तियों का ब्रिटिश कॉमन वेल्थ को त्यागने समेत हस्तांतरित हुआ, और एकीकृत भारत का केंद्रीय विधान सभा भी खत्म हुआ, जिसके जगह संविधान सभा को ही कानून निर्माता माना गया, जो अब अंग्रेजो के असीम ताकतों का भी उत्तराधिकारी भी बन गयी। तथा अर्धरात्रि, १४-१५ अगस्त १९४७ को भारतीयों को उनकी स्वायत्ता सौंपी गई। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने उन अथाह संघर्षों और त्याग को याद किया, पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्रस्ताव किया कि संविधान सभा के सभी सदस्य भारत और उसकी जनता की सेवा की शपथ लेंगे।

प्रसव काल के दौरान चिकित्सीय कारण या स्वास्थ्य अलाभ की स्थिति में जच्चा बच्चा कठिनाई में आ जाते है, अब जो 'जी' जाए उसी को जीवन पर्यंत यह तारीख एन केन प्रकारेण सालती रहेगी, भारत के आजाद होते ही इस पवित्र भारतभूमि को अनन्य कष्ट हुए, उस तारीख को पीड़ित अपने कष्ट बढ़ाने वाले तो सभी प्रमुख नेता समेत आजादी के मतवाले शिरोधार्य करते है, ऐसी अबूझ मारकाट मची थी कि उसकी पीड़ा आज भी देश के अंग प्रत्यंग में विभिन्न समस्याओं के रूप में गोचर हैं।

पिछले पोस्ट में आपने पढ़ा कि सरदार पटेल पर कितने देशी रियासतों की दारोमदार थी।

जिस समय आजादी मिली गांधीजी उस समय बंगाल में जन-जन तक प्रतिघर  देश के लिए अलख जगा रहे थे। सन् १९४६-४७ में हुए साम्प्रदायिक दंगे में टीस से भर उठे उनमे से एक थे ठक्कर बापा, साम्प्रदायिक दंगे की स्थिति से व्याकुल यह ७७ वर्ष की उम्र में भी गांधी जी के पास नोआखाली दंगे शांत कराने गये।

गांधी जी के अनुयायी, पद्मभूषण मन्नतु पद्मनाभन स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम दिनों में केरल कांग्रेस का नेतृत्व करते रहे, त्रावणकोर को भारत से पृथक करने के दुस्साहस के प्रति कड़ा विरोध जताया और ६८ साल के उम्र जेल चले गये, १९४८ में यह विधान सभा के सदस्य भी रहे।

आजादी के बाद देश के सामने कई बड़ी समस्याएं आई थी, विभाजन के फलस्वरूप देश के कई भागों में हिन्दू-मुस्लिम दंगों से धरती दग्ध हो रही थी, जब हजारो के संख्या में अफसर पाकिस्तान चुन कर चले गए, तब प्रशासन की कठोर समस्या पर सरदार पटेल ने अपनी विलक्षण बुद्धि से काबू पाया उन्होंने ही भारतीय प्रशासन को इंडियन सिविल सर्विसेज के स्थान पर निर्मित किया। सरदार पटेल ने सरकारी खर्चो में ७८ करोड़ की कमी की।

स्वतंत्रता में बाधक बनने को तैयार अँग्रेजो ने मुस्लिम लीग को महत्ता देने समेत देशी रियासतों को पूर्ण स्वतंत्रता देते हुए, "जाओ तुम चाहे जहाँ" का पत्ता भी खेला, तब सरदार पटेल की अपरिमित विलक्षण बुद्धि से स्वतन्त्र होने के स्वपन्द्रष्टाओं राजा और नवाबो को भारत मे शामिल किया।

संविधान

एक संविधान किसी राष्ट्र के स्वतंत्रता का खुला समर्थक हैं।

संविधान सभा अपने शुरुआती दशा दिशा में जब इस बात पर ध्यान लगा रही थी कि संविधान के मुख्य आदर्श क्या हो? जो लोकतांत्रिक महिमा को भी खण्डित ना करे उस समय पहले ही शंका और अविश्वास की लहर चल रही थी, पिछले पोस्ट में आपने मुस्लिम लीग की भूमिका जान ही ली हैं, दिसंबर, ६, १९४६, को ब्रिटिश सरकार ने वक्तव्य दिया कि क्या यह संविधान आवाज है या देश के अनिच्छुक राज्यो पर थोपी जा रही है, जब कि यह विदित हैं, की एक विदेशी चार्टर मात्र के माध्यम से छोटे से लेकर बड़े सभी राजाओ की अंग्रेजो के समक्ष क्या स्थिति थी, अंग्रेजी सरकार की स्थिति वैसे ही जर्जर हो चुकी थी ऐसे तर्क स्वतन्त्रता हेतु एक प्रस्तावित उद्देश्य से जल्द ही सुलझा लिए गए। वही अन्य देशी रियासतों ने यह कहना शुरू जर दिया कि ये शक्तियां केवल संप्रभुता से ली जा रही हैं ना कि आम जनता से। 


विसंगतिया

वो जो लगन है, जो भारत के लिए दीवानों की टोली बन जाती हैं, जिसके लिए अनगिनत शहादतें हुई है, क्यों उसके लिए कई किस्म के कमतर शब्दो का प्रयोग, सेना के लिए, सरकारी संस्थानों/प्रतिष्ठानों के लिए, दुर्व्यवहारी होना आजकल cool बनते जा रहा है, मानो आजादी का अपशब्द कह सकने के अलावा कोई मोल नहीं हो।यहां तक कि कुछ trendy जनों और shout culture में यह कसौटी बन गई हैं, जब कि कोई भी स्वतन्त्रता जस का तस बिना किसी निर्बंधन या मनाही के नहीं है। 

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संदर्भ:- भारत के गौरव(५,८ भाग), स्व-अध्ययन

मंगलवार, 11 अगस्त 2020

Leading towards date of freedom, Lala Lajpat Rai, लाला जी

श्रृंखला

क्रमवार

पंजाब केसरी

सम्पादित:- सीमा शर्मा

"मेंरी छाती पर हुआ एक-एक वार  भारत मैं ब्रिटिश साम्राज्य वाद की काठी में एक-एक कील साबित होगी",  यह कहने वाले लाला  लाजपतराय का जन्म, २८ जनवरी, १८६५ में गाँव ढुड्ढी, ननिहाल में हुआ, कस्बा जगरांव, जिला  लुधियाना पंजाब, के व्यापार मंंडी में इनके दादा की दुकान थी और इनके पिता स्कूल में शिक्षक थे।
इन्होंने साहित्य और समाज दोनो की विद्यार्थी जीवन से ही भरपूर सेवा की, यह हिसार में ही वकालत की प्रैक्टिस करने लगे, जिसमे इन्हें इनकी प्रखर बुद्धि से और निधड़क बोलने से सफलता प्राप्त हुई,  इनके पिताजी स्वामी दयानंद सरस्वती के अनुयायी थे, लाला लाजपत राय ने एक शाखा हिसार में आर्य समाज मे स्थापित की जिसका मुख्य कार्य अछूतोद्धार था, जाति के बड़े अंग को अछूत माने जाने को यह अन्याय मानते हूऐ इन्होंंने कांगड़ा और संयुक्त प्रान्त के पहाड़ी इलाके (हिमालय, शिवालिक, विध्यांचल, कैमुर) में शिक्षा का प्रचार किया, जहां इनके द्वारा दिए गए ४०,००० रुपये से पाठशालाएँ खोली गई। अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से अप्रसन्न हो कर लाला हंसराज के सहयोग से इन्होंने लाहौर में दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज स्थापित किये, (पंजाब में आर्य समाज का सर्वाधिक विस्तार हुआ था जिसने लाला हंसराज और लाला लाजपत राय जैसे राष्ट्रवादियों को जन्मा था), यह तीन साल तक म्युनिसिपल बोर्ड में अवैतनिक मंत्री भी रहे, जहां इनके कार्य से सभी प्रसन्न रहते थे।
बंगाल मध्यप्रान्त राजपूताने में पड़े अकाल के कारण कई अनाथ बच्चों को फिरोजपुर और लाहौर के अनाथालयों में ईसाई पादरी ज़बरदस्ती धर्मांतरण करा रहे थे, अकाल पीड़ितों का पहले ही जिम्मा ले चूके लालाजी उनको अन्न पहुंचा रहे थे एवम इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठायी। मिंटगुमरी में हो रहे किसान आंदोलन, एक पत्रिका के संपादक को कारागार में डालने से इनका विरोध देख के छल से डिप्टी कमिश्नर ने कचहरी जाते समय इनको गिरफ्तार कर लिया।
मांडले जेल में १८ महीने रहते हुए इन्होंने महान अशोक, श्रीकृष्ण और उनकी शिक्षा, छत्रपति शिवाजी नामक पुस्तकें लिखी। 
यह उर्दू भाषा मे लिखते थे, जिसमे इन्होंने मैजिनी और गैरीबाल्डी जैसे देशभक्तों की जीवनियां लिखी, १९१४ इंग्लैंड में प्रतिनियुक्ति में जाने के बाद यह जापान गये, फिर लौटने के पहले ही महायुद्ध शुरू हुआ और भारत सरकार ने आने की इजाजत नहीं दी, जिसके बाद यह अमेरिका गए जहाँ इनकी लिखी पुस्तक यंग इंडिया सुप्रसिद्ध रही, वापस लौटने पर यह कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में यह प्रधान चुने गए, जिसके बाद यह फिर गिरफ्तार कर लिए गए जिसके बाद यह अस्वस्थ रहने लगे, इन्होंने सर्वेन्ट्स ऑफ पीपल सोसाइटी स्थापित की, लाहौर में तिलक स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स स्थापित की, सदा देशहित को सर्वोपरी मानने वाले लालाजी का निधन साइमन कमीशन का विरोध करते समय ब्रिटिश पुलिस के हिंसामय हो कर लाठी से इनके छाती में वार किया, जिससे इनको छाती में सूजन हो गयी और बुखार में इसी रोग से सन् १९२८, १७ नवम्बर को हुआ।

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शनिवार, 8 अगस्त 2020

Quit India Movement

भारत छोड़ो आंदोलन

श्रृंखला(क्विट इंडिया)

क्रमवार

अनुक्रमणिका 
१ परिस्थिति द्वितीय विश्वयुद्ध  के समय की 
२ श्रीनिवास शास्त्री 
३ पट्टाभि सीतारामय्य
४ सरोजिनी नायडू 
५ पंडित रविशंकर शुक्ल
६ वल्लभ भाई पटेल 
७ प्रभाव 
८ द्वितीय विश्वयुद्ध का अंत 

भारत छोड़ो आंदोलन का आगाज

द्वितीय विश्व युद्ध के समय क्विट इंडिया रेसोलुशन की आवश्यकता 
भारत के सुरक्षा हेतु यह जरूरी था कि तत्काल रूप से अंग्रेज भारत छोड़ कर चले जाएं, जापानी सेना की पूर्वी भारत के सीमाओं में उपस्थिति, भारत के सुरक्षा हेतु गंभीर खतरा थी, अंग्रेजो की उपस्थिति से भारत जापानियों का निशाना बना था, यह खतरा फेरा जा सकता था यदि अंग्रेज भारत छोड़ चले जाए, अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने ८ अगस्त, १९४२ को प्रस्ताव पारित किया। 
लीलनिथगो के द्वारा अपनायी जा रही दमनकारी नीति से जिसमे शीर्ष नेताओ को गिरफ्तार किया जा रहा था, जिसमे अंग्रेजी सरकार ने प्रांतीय कोंग्रेस समिति को अवैधानिक घोषित किया जाना था से भारतीय समुदाय में भीषण असंतोष को जन्मा एक सप्ताह तक श्रमिक और कामगारों द्वारा उद्योगों से, मिलो से, कारखानों से हड़ताल प्रदर्शन किया गया।

भूमिका

भारत पर शासन को और अधिक सुलभ बना देने के लिए अंग्रेजीदां सरकार ने भारत सरकार अधिनियम १९३५ पारित किया, अप्रैल १९३६ के लखनऊ अधिवेशन में कांग्रेस ने इसे अस्वीकार्य बताया, सर सी.वाय चिंतामणि जैसे उदार वादी नेताओ ने भी इसे भारतीयों के विरुद्ध कहा था, कांग्रेस का मानना था कि ऐसे संविधान का क्या लाभ जो वयस्क मताधिकार से निर्मित न हो या उसके समकक्ष न हो? हालांकि फरवरी में हुए १९३७ के चुनाव में न केवल हिस्सा लिया बल्कि पूर्ण बहुमत प्राप्त की, १९३७ में ही बर्मा को अंग्रेजों ने पृथक कर दिया, मद्रास, केंद्रीय प्रान्तों, एवं बिहार ओडिसा के संयुक्त प्रांतों में बहुमत में रही, बॉम्बे, बंगाल, असम, उत्तर पश्चिम सीमांत प्रान्तों में तथा सिंध एवं पंजाब छोड़ कर सभी जगह एकमात्र उदघोषित पार्टी बन कर उभरी, वही मुस्लिम लीग को एक भी स्थान प्राप्त नहीं हुआ, जीत कर भी कांग्रेस ने कार्यालयों को ग्रहण कर के मंत्रिमंडल बनाने से यह कहते हुए इंकार किया की उन्हें तत्कालीन वाइसराय लीलनिथगो से आश्वासन चाहिए कि उनके गवर्नर जनरल उनके दैनन्दिन कार्यो में कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे,  ऐसी आश्वासन मिलने के बाद ये कार्यालय ग्रहण किये गए, और मंत्रीमण्डल बनाये, जो अनवरत रूप से दो वर्षों तक चला, द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रारम्भ होते ही सेप्टेम्बर १९३९ में भारत को अंग्रेजो ने युद्धरत देशों में शुमार कर लिया,  कांग्रेस ने उचित शब्दो एवम प्रकार से इसका पूर्ण विरोध किया, जिसके फलस्वरूप पंजाब के और सिंध के प्रान्तों के अलावा ८ प्रान्तों से इस्तीफा दिया, जिसे मुस्लिम लीग ने तीन रुचार पुस्तिका बांट कर मुक्ति दिवस के रूप में मनाया साथ ही साथ आरोप लगाया कि कांग्रेस अपने क्षेत्रों में मुस्लिमो से सौतेला व्यवहार करती थी, कांग्रेस ने युद्धोन्माद में लिप्त किसी भी कार्य को बढ़ावा देने से इनकार किया और कहा वह साम्राज्यवाद या विस्तारवाद को बढ़ावा देने की नीति का भरपूर विरोध करती है, जिसके बाद मार्च, १९४० में लाहौर अधिवेशन में जिन्नाह ने दो राष्ट्र की नीति का पटाक्षेप किया, तथा हिंदुस्तान और इस्लाम की भिन्न बताया, बेहद आहत इस वक्तव्य से गांधी जी मे कहा कि ऐसी स्वतंत्रता नहीं चाहिए जो अंग्रेजो के छोड़े हुए भग्नावेष से मिले, तथा अब युद्ध की स्थिति में स्वतंत्रता प्रदाय किये जाने के वचन से भारत सहयोग करेगा।

यूरोप में युद्ध की बढ़ती हुई गम्भीरता को देखते हुए भारतीय संसाधनों के अधिकाधिक उपयोग के लिए एकतरफा बनाया गया अगस्त प्रस्ताव ८ अगस्त १९४० को आगे रखा। जिसमे यह कहा गया कि कार्यकारिणी परिषद  तथा युद्ध  हेतुक के परामर्श परिषद के गठन के अंतरिम उपाय को न रोका जाए, जहां राष्ट्रीय जीवन खुद युद्ध के संघर्षों में ग्रस्त है, संवैधानिक उपबंधों की समीक्षा नहीं कि जा सकती, तथा युद्ध के पश्चात संविधान सभा का गठन भारतीय संविधान के लिए किया जाएगा और किसी समझौते के जो संविधान सभा गठन में सहयोग करे का वह स्वागत करते हुए प्रतिसहयोग करेंगे, रक्षा समझौते को ध्यान में रखते हुए, भारतीय राज्यों से संधि अनुरूप उनके स्वयं के आर्थिक, राजनैतिक एवं सामाजिक संरचना के अनुरूप स्वयं के संविधान रचना करने के अधिकार को सुरक्षित किया।

मुस्लिम लीग के तुष्टिकरण हेतु ऐसे किसी भी संविधान को नकारने का संदेश दिया जो किसी इतने प्रभुत्व व बहुतायात समुदाय के हितों की रक्षा नहीं करेगी, या आहत करती है। तब, महात्मा गांधी ने कहा था कि तत्कालीन समस्या स्वतंत्रता की नहीं बल्कि जीने के अधिकार की है, यथा आत्म अभिव्यक्ति की।

१६ सिंतबर १९४० के प्रस्तावना में कांग्रेस ने अपने युद्ध संबंधी सहयोग के वचन को अस्त होने बताया,

१७ अक्टूबर १९४० को सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारम्भ किया।

क्रिप्प्स मिशन के असफलता के बाद गोवालिया टैंक मैदान में गांधी जी ने भाषण दिया अगस्त १९४२ में कांग्रेस ने गांधी जी के सुझाव पर प्रसिद्ध भारत छोड़ो का प्रस्ताव पारित किया यूसुफ मेहर अली का दिया नाम क्विट इंडिया गांधी जी को पसन्द आया यूसुफ मेहर अली ने इस नाम से किताब भी प्रकाशित की, क्विट इंडिया का मतलब था अंग्रेज तुरंत भारत से चले जाएं नही तो बहुत जबरदस्त आंदोलन छेड़ दिया जाएगा सवेरे ही सब नेताओ को अंग्रेजो द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया, पर आंदोलन तेजी से चलता रहा, करो या मरो का नारा गांधी जी ने ही इस समय दिया था, दूसरे दिन बम्बई में पूरी हड़ताल हो गयी, सारे शहर में इतने बड़े नेताओं की गिरफ्तारी से रोष फैल गया। इसे अगस्त क्रांति के नाम से भी जाना जाता है, जिसके बाद प्रदर्शनों का जोर चला, मन्त्रणा, बैठक, हड़ताल, जुलूस की बहार आ गई, अंग्रेजी सरकार की नींव ही हिल गई थी, मगर यह विरोध का भी लाठीचार्ज, गोलीबारी, सम्पत्ति जब्त करने से, गिरफ्तारी से दमन किया, जनता ने इसमें कई डाकखाने, म्युनिसिपल सम्पत्ति,रेलवे, पुलिस स्टेशन्स भी ध्वस्त कर दिए, इस समय अंग्रेजी सरकार ने अखबारों को नियंत्रित करने के लिए निषिद्ध किया गया, इससे अंग्रेजी सरकार को आमजनता की ताकत का अहसास हुआ।

सितम्बर, १९४२, में विस्फोटक पुलिस पर फेके गए, १९४४ में महात्मा गांधी को मुक्त किया गया, जिससे इस आंदोलन ने ऊंचाई खो दी।

कई नेता जो इसमें गांधी जी के साथ थे उनमे से एक थे।

श्रीनिवास शास्त्री 



सन् १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन के समय उन्होंने इस बात और जोर दिया कि महात्मा गांधी आदि कांग्रेस नेता ही देश के वास्तविक नेता है, और ब्रिटिश सरकार को उन्ही से राजनीतिक समझौता करना चाहिए, क्रिप्प्स मिशन के केंद्र में भी इनका यही मत था। यह सिद्धान्तवादी राजनीतिज्ञ श्रीनिवास शास्त्री की रामायण में आस्था थी जिसकी उन्होंने ३० व्याख्यान दिए, और वह अब प्रकाशित है,उनका मत था की रामायण के प्रचार से राष्ट्र कल्याण अधिक हो सकता था।

पट्टाभि सितारामय्य



अखिल भारतीय देसी राज्य प्रजा परिषद के १९४६ से १९४८ तक रहे अध्यक्ष और गाँधीज्म एंड सोशलिज्म के लेखक डॉ० सीतारामय्य १९२० में  गांधी जी के प्रभाव में आये, मार्च १९४२ के क्रिप्प्स मिशन को देशी रियासतों के समस्याओं से स्टैनफर्ड क्रिप्प्स को अवगत कराया, भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने से यह जेल में डाल दिये गए, डॉ० पट्टाभि भारत के संविधान सभा मे चुने गए थे,

सरोजिनी नायडू 



गोल्डन थ्रेशहोल्ड, बर्ड ऑफ टाइम, ब्रोकन विंग की कवियत्री, भारत कोकिला, गांधी जी से प्रभावित थी, वह कई बार जेल गयी, आखिरी बार भारत छोड़ो आंदोलन के समय जेल जाने के बाद तीन साल बाद अन्य नेताओं के साथ मुक्त हुई।

पंडित रविशंकर शुक्ल

 ने  छत्तीसगढ़ से भारत छोड़ो आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई, अधिक पढ़ने के लिए:-

 .पं० रविशंकर शुक्ल

वल्लभ भाई पटेल



८ करोड़ ६५ लाख, ५ लाख वर्गमील के ५६२ देशी रियासतों को जोड़ने वाले, सरदार पटेल को भारत छोड़ो आंदोलन में जुड़ने से वल्लभ भाई पटेल गिरफ्तार किए गए जहां उन्हें १५/०६/१९४५ को अन्य नेताओं के साथ मुक्त किया गया।

स्वतंत्रता के बाद सूचना प्रसारण विभाग के सदस्य, और भारतीय रियासतों का विभाग से सम्भाला, जिसके बाद वह उपप्रधानमंत्री रहे।

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दूसरी विश्व युद्ध के परिणामस्वरूप राजनीतिक संसार मे उथलपुथल मचा दिया, विश्व को दो बड़ी शक्तियों का प्रादुर्भाव देखने को मिला जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ समाजवादी गणराज्य आते है, कई राज्यो ने समाजवाद अपनाया, और साम्राज्यवाद के सेना और शक्ति का हास् हुआ, अब ब्रिटेन मात्र ही शक्तिशाली नहीं था, जिसके बाद उदार वामपंथी विचारधारा वाली राजनीतिक पार्टी है, १९वीं सदी के पूर्वार्ध में, मजदूर संगठनो, समाजवादी राजनीतिक दलों के उठाव के साथ हुआ। इंग्लैंड के सामान्य चुनाव कंज़र्वेटिव पार्टी और लेबर पार्टी के मध्य हुई जिसमें लेबर पार्टी की जीत हुई।

मुस्लिम लीग के मो० अली जिन्नाह ने इसे हिन्दू राज के लिए लक्षित बताया, की यह न केवल अंग्रेजों के विरूद्ध हैं, बल्कि यह मुस्लिम पक्ष का दमन करेगी, यह भारत के मुस्लिम पक्ष के लिये घातक है, जिससे इस के अखिल भारतीय मुस्लिम लीग समिति ने सम्मेलन कर कहा कि वह सभी ऐसे किसी भी कार्य, जो कांग्रेस द्वारा प्रायोजित है से दूर रहे जिसमे यह अंग्रेजी सरकार से कहा कि यह बंटवारा कर के भारत छोड़ दे, कम्युनिस्ट पार्टी ने भी अंग्रेजी सरकार का साथ दिया, इन विभिन्न कारणों से यह आंदोलन अपने सम्पूर्ण लक्ष्य को ग्रहीत नहीं कर पाई।
रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने एक रुपये का सिक्का क्विट इंडिया आंदोलन के प्रतीकात्मक जारी किया था।
फन फैक्ट:- चाचा चौधरी का ट्रक डग डग दूसरे विश्व युद्ध के समय का है जब उसे जापानी बर्मा के सीमा में छोड़ गए थे तब उसे चाचाजी(चौधरी) ने अंग्रेजो से खरीद लिया था।

सन्दर्भ:- भारत के गौरव कक्षा आठ के आई. सी. एस. ई, के इतिहास की किताब एवं विषय:- विधिक और संवैधानिक इतिहास- Dr. Paranjape
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